राष्ट्रीय कृषि वैज्ञानिक सम्मेलन में भविष्य की खेती पर मंथन

ग्वालियर। रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते उपयोग से कमजोर होती मिट्टी और घटते कार्बन स्तर पर गंभीर चिंता जताते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने प्राकृतिक व गौ-आधारित खेती को भविष्य का रास्ता बताया। भारतीय एग्रो इकोनॉमिक रिसर्च सेंटर एवं राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय के तत्वावधान में सोमवार को आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कृषि वैज्ञानिक सम्मेलन का शुभारंभ दत्तोपंत ठेंगड़ी सभागार में हुआ। उद्घाटन सत्र में वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि सतत कृषि मॉडल अपनाए बिना मिट्टी और किसान दोनों का भविष्य सुरक्षित नहीं रह सकता।

कुलगुरु डॉ. अरविंद कुमार शुक्ला ने कहा कि अधिक उत्पादन की होड़ में रासायनिक खादों के अंधाधुंध प्रयोग ने भारतीय कृषि को नुकसान पहुंचाया है। मिट्टी की उर्वरता और कार्बन घटने से उत्पादन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। उन्होंने इंदौर का उदाहरण देते हुए बताया कि 150 वर्ग मीटर क्षेत्र में वैज्ञानिक पूरी तरह प्राकृतिक पद्धति से 20 हजार रुपये तक की पैदावार कर रहे हैं। डॉ. शुक्ला ने स्मरण कराया कि महान विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी ने वर्ष 1985 में गौ-आधारित कृषि प्रकल्प की नींव रखी थी। आज उसी दृष्टि को आगे बढ़ाते हुए यह सम्मेलन उनके नाम पर बने सभागार में आयोजित हो रहा है।

सम्मेलन में गौवंश आधारित खेती को वैज्ञानिक आधार पर प्रोत्साहित करने के प्रयासों को सराहा गया। आयोजकों के अनुसार परंपरागत भारतीय कृषि ज्ञान को आधुनिक शोध के साथ जोड़ना समय की आवश्यकता है। दो दिवसीय कार्यक्रम में विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों से आए शोधार्थी अपने शोधपत्र प्रस्तुत करेंगे।

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