बहन की आँखों में सजे सपने, अपनी पलकों पर संघर्ष

उज्जैन: प्रयागराज महाकुंभ में जो दो बहने वायरल हुई थी और अपनी नीली आंखों से चर्चा में आई. उसके बाद सोशल मीडिया पर लगातार छाई रही. संतों-महंतों, महामण्डलेश्वरों के कुंभ में गंगा के तट पर माला कंठी रुद्राक्ष बेचने वाली बहनों की खूब चर्चा रही, एक बहन मुंबई ग्लैमर की दुनियां में पहुंच गई,वही दूसरी बहन का क्या हुआ, नवभारत में पढ़िए खास खबर.

यूं तो दुनिया बहुत बड़ी है, बावजूद इसके कुछ चेहरे अपनी सादगी और संघर्ष से इतिहास लिख देते हैं जो अमिट छाप बन जाते है. प्रयागराज महाकुंभ की वह नीली आँखों वाली लड़की याद है? जी हाँ, मोनालिसा. जिसने अपनी जादुई आँखों और रुद्राक्ष बेचते हुए सादगी से पूरे देश को अपना मुरीद बना लिया था. आज मोनालिसा फिल्मी पर्दे की चकाचौंध में अपनी जगह बना चुकी हैं, इसी कहानी का एक दूसरा हिस्सा बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन में क्षिप्रा के तट पर अपनी तकदीर लिख रहा है. वह हिस्सा है मोनालिसा की छोटी बहन इशिका, जो अपनी बहन की कामयाबी के लिए खुद पीछे हट गई और आज खुले आसमान के नीचे परिवार का सहारा बनी हुई है. उज्जैन कार्तिक मेला ग्राउंड के सामने रणजीत हनुमान मंदिर मार्ग पर एक डेरे में इशिका रह रही है, और माल बेचकर अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर रही है.

बहन की उड़ान के लिए खुद जमीन बनी इशिका
जहाँ मोनालिसा इन दिनों मशहूर डायरेक्टर सनोज मिश्रा के साथ अपनी आने वाली फिल्मों की शूटिंग में व्यस्त हैं, वहीं इशिका उज्जैन में महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर कंठी-माला और रुद्राक्ष बेच रही हैं. जब उनसे पूछा गया कि वह अपनी बहन की तरह पर्दे पर क्यों नहीं दिखीं, तो इशिका की आँखों में एक अजीब सी चमक और संतोष था. उसने बताया मैं अपनी बहन से बहुत प्यार करती हूँ. मैं चाहती हूँ कि वह खूब आगे बढ़े, इसलिए मैंने खुद कदम पीछे खींच लिए ताकि उसे मौका मिल सके. मैं यहाँ अपने पिता के व्यापार को संभाल रही हूँ ताकि हमारे परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सके.

खुले आसमान के नीचे संघर्ष और महाकाल पर अटूट विश्वास
वर्तमान में इशिका अपने परिवार के साथ क्षिप्रा नदी के किनारे एक अस्थाई डेरे (झोपड़ी) में रह रही है. सुख-सुविधाओं से दूर, अभावों के बीच रहते हुए भी उसके चेहरे पर शिकन नहीं है. इशिका कहती है कि वह बाबा महाकाल को ही अपना सब कुछ मानती हैॉ. फिल्मों में जाने के सवाल पर वह बड़ी सादगी से कहती है, बाबा महाकाल मेरे पिता हैं, अगर उनका आशीर्वाद हुआ और उन्होंने चाहा, तो एक दिन मैं भी पर्दे पर दिखूँगी.

बदले उज्जैन को देख मुख्यमंत्री की मुरीद हुई इशिका
इशिका ने उज्जैन में आए बदलावों को करीब से महसूस किया है. उसने बताया कि जब वह प्रयागराज में थी, तब का उज्जैन और आज का उज्जैन पूरी तरह बदल चुका है. महाकाल परिसर से लेकर पूरे मंदिर परिसर का विस्तार देखकर वह दंग है. इशिका कहती है कि यह सब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के प्रयासों का फल है. उन्होंने उज्जैन की सूरत ही बदल दी है. इशिका मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मिलने की इच्छा रखती है. उसने सुना है कि वे बहुत मददगार हैं और वह उन्हें अपने हाथों से रुद्राक्ष की एक विशेष माला भेंट करना चाहती है.

सिंहस्थ की तैयारी और उम्मीदों का कारवां
इशिका और उसका परिवार अभी से आने वाले सिंहस्थ कुंभ की तैयारियों में जुटा है. उनका कहना है कि वे कुंभ में भी इसी तरह रुद्राक्ष और माला बेचकर अपनी परंपरा और व्यापार को जीवित रखेंगे.

ग्लैमर के पीछे त्याग
यह कहानी केवल रुद्राक्ष बेचने वाली एक लड़की की नहीं है, बल्कि उस त्याग की है जो एक बहन दूसरी बहन के लिए करती है. जहाँ एक तरफ ग्लैमर की दुनिया है, वहीं दूसरी तरफ क्षिप्रा के घाटों पर संघर्ष और सेवा की मिसाल पेश करती इशिका है.

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