जयपुर 09 फरवरी (वार्ता) राजस्थान उच्च न्यायालय ने पारिवारिक विवाद में सोमवार को एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए कहा कि जहाँ माँ अपनी ही बेटी की माता होने से इन्कार करती है, वहाँ बेटी के मातृत्व को साबित करने के लिए डीएनए परीक्षण कराया जा सकता है।
अदालत ने इस फैसले से निचली अदालत का निरस्त किया हुआ आदेश रद्द कर दिया, जिसमें डीएनए परीक्षण की अनुमति देने से इन्कार किया गया था।
न्यायमूर्ति विपिन गुप्ता ने कहा कि जब कोई माता ही यह दावा कर रही हो कि उसकी बेटियाँ उसकी जैविक संतान नहीं हैं, तो यह मामला सिर्फ पिता-संबंध (पितृत्व) से जुड़ा नहीं बल्कि मातृत्व से जुड़ा विवाद बन जाता है और इसे वैज्ञानिक रूप से जांचने की आवश्यकता पड़ती है। इसीलिए डीएनए परीक्षण की अनुमति दी जानी चाहिए ताकि विवाद का निष्कर्ष निष्पक्ष और स्पष्ट रूप से निकाला जा सके।
अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि निजी और संवेदनशील मामलों में न्यायालय को बहुत सावधानी से निर्णय लेना चाहिए, लेकिन जब मामला माता-बेटी के जैविक संबंध को लेकर सीधे सवाल उठा रहा हो, तो वैज्ञानिक सुबूत का इस्तेमाल करना न्यायसंगत है।
आदेश में स्पष्ट किया गया है कि केवल संदेह या अटकलों के आधार पर डीएनए परीक्षण नहीं कराया जाएगा, बल्कि अदालत अपने विवेक और तथ्यों के आधार पर ही ऐसा निर्देश देगी। इससे पहले निचली अदालत ने डीएनए परीक्षण के आवेदन को गोपनीयता और निजता के कारण अस्वीकार कर दिया था, जिसे अब उच्च न्यायालय ने पलट दिया है।
राजस्थान उच्च न्यायालय का यह निर्णय वैज्ञानिक सुबूतों और पारिवारिक कानून में विकास की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है, खासकर ऐसे मामलों में जहाँ पारिवारिक सम्बन्धों के बुनियादी प्रश्न खड़े होते हैं और जीवित व्यक्ति की पहचान ही विवाद में हो।
