विन्ध्य की आध्यात्मिक चेतना के प्रतीक थे महाराजजी

डॉ संजय पयासी सतना

विन्ध्य के विकास की कहानी जितनी पुरानी है. उतनी ही पुरानी यहाँ की आध्यात्मिक चेतना है. जिसके स्थापित प्रतीक थे धारकुंडी आश्रम के प्रमुख परमहंस स्वामी सच्चिदानंद महाराज.उनके स्थूल शरीर छोड़ सूक्ष्म आत्म के रूप में विलीन होने की घटना ने जनमानस को झकझोर के रख दिया है.सती अनुसुइया के परमहंस आश्रम के संस्थापक परमहंस स्वामी परमानन्द महाराज के तीन प्रमुख शिष्यों में परमहंस स्वामी भगवनानन्द महाराज,परमहंस स्वामी सच्चिदानंद महाराज और वर्तमान में सत्तेसगढ़ आश्रम के प्रमुख परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्द महाराज थे.सती अनुसुइया आश्रम के स्वामी जी की अनेकों किवदन्ती लोकप्रिय है.

घनघोर जंगल,पहाड़ और तरह-तरह के जंगली जीवों से फलफूल रहे इस क्षेत्र में अत्रि मुनि और सती माता अनुसुइया की तपोस्थली को फिर से विकसित कर आधात्मिक चेतना का केंद्र बनाने गुरु स्वामी परमानन्द के सानिध्य में पारलौकिक ज्ञान के पुंज को अंतर्मन में जाग्रत कर जनमानस में सनातनी संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना को स्थापित करने वाले परमहंस स्वामी सच्चिदानंद ने चित्रकूट से भी अंदर एक ऐसे स्थल को अपने तप के लिए चयनित किया जब वहाँ दिन के उजाले में भी पहुँच पाना सम्भव नहीं था.

संयोग ही था का धारकुंडी का यह स्थल द्वापर का महत्वपूर्ण स्थल था.कहा जाता है कि यही वह स्थान है जहाँ वनवास के दौरान पांडवों को यक्ष ने आधात्मिक चेतना का एहसास कराया था.अभी भी यहाँ स्थापित अभ्मर्षण कुंड में सप्तमी रविवार के स्नान का विशेष महत्व है.बताते हैं कि स्वामी जी ने आश्रम के पास प्राकृतिक जलधारा वाली गुफा में बारह वर्ष घनघोर कठिन तपस्या की.इस दौरान क्षेत्रीय लोगों का भी इस जगह पर आना-जाना नहीं था. जंगलों में पालतू जानवर रख दूध का व्यवसाय करने वाले गड़रिया वहाँ कभी जानवर चराने पहुँच जाया करते. कहा यह भी जाता है कि तपोस्थली वाली गुफा में पहिले से किसी अदृश्य ताकत का निवास था.

जिसने स्वामी जी के प्रवास पर अड़चने पैदा की पर दृढ़ संकल्प के धनी महाराजजी ने उस स्थल को नही छोड़ा.वर्तमान में सुरम्य तपोभूमि के रूप में विकसित हो चुके इस आश्रम में देश-विदेश के हर कोने से लोग अपनी आत्मिक संतुष्टि के लिए पहुँचते हैं. स्वामी सच्चिदानंद महाराज ने अपने जीवनकाल में देश के कई हिस्सों में परमहंस आश्रम स्थापित किए वर्तमान में वे मुंबई बदलापुर स्थित आश्रम में पिछले कई वर्षों से प्रवास पर थे.बीच मे दो बार उन्होंने धारकुंडी लौटने की इच्छा की ओर लौटे भी पर स्वास्थ्य के चलते शिष्यों के आग्रह पर उन्हें पुनः मुंबई बदलापुर लौटना पड़ा.लिखने के लिए उनके साथ बीते क्षणों के दर्जनों किस्से हैं, पर यह स्पष्ट है कि उनके अपने बीच नही होने से जो शून्यता पैदा हुई है उसकी पूर्ति फिलहाल असम्भव प्रतीत होती है.

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