जेयू की राष्ट्रीय इतिहास संगोष्ठी में 54 शोधपत्रों का हुआ वाचन

ग्वालियर। भारतीय ज्ञान परम्परा हमारी सांस्कृतिक पहचान का मूल आधार है। यह परम्परा केवल अतीत तक सीमित नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य को भी दिशा देने में सक्षम है। यह बात उत्तरप्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग लखनऊ की निदेशक रेनू द्विवेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययनशाला में प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा अभियान द्वारा प्रायोजित भारतीय इतिहास में भारतीय ज्ञान परम्परा विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि कही। अध्यक्षता जेयू के प्रभारी कुलगुरु प्रो. जेएन गौतम ने की। विशिष्ट अतिथि डॉ. दिनेश शर्मा, कुलसचिव डॉ. राजीव मिश्रा व आयोजन सचिव डॉ. शांतिदेव सिसोदिया मंचासीन रहे। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. राजीव मिश्रा ने कहा कि भारतीय इतिहास लेखन में भारतीय दृष्टिकोण को प्राथमिकता देना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा समाज के नैतिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक विकास की आधारशिला रही है। इस संगोष्ठी के माध्यम से शोधार्थियों को अपने विषयों को नए दृष्टिकोण से देखने का अवसर मिला है। विशिष्ट अतिथि डॉ. दिनेश शर्मा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा बहु विषयक है, जिसमें वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, गणित, खगोलशास्त्र, व्याकरण और राजनीति शास्त्र जैसे विषयों का समन्वय दिखाई देता है। प्रो. जेएन गौतम ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा हमारे राष्ट्र की आत्मा है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों का दायित्व है कि वे पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक शिक्षा के बीच सेतु का कार्य करें। डॉ. शांतिदेव सिसोदिया ने कहा कि पीएम ऊषा जैसी योजनाएं उच्च शिक्षा संस्थानों को शोध एवं अकादमिक गतिविधियों के लिए नई ऊर्जा प्रदान कर रही हैं। संगोष्ठी में कुल 54 रिसर्च पेपर पढ़े गए।

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प्रो. शांतिदेव सिसोदिया व प्रो. चारू कटारे पुनः बने विभाग संकायाध्यक्ष

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