
भोपाल। विदिशा जिले में एक गर्भवती महिला को कड़ाके की ठंड में तिरपाल की ओट और टॉर्च की रोशनी में सड़क किनारे बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर होना पड़ा। यह घटना कोई दुर्भाग्यपूर्ण अपवाद नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी सच्चाई को उजागर करने वाला गंभीर आरोप है। जानकारी के अनुसार, महिला को समय पर न तो 108 एम्बुलेंस सेवा मिली और न ही जननी एक्सप्रेस, जबकि आपातकालीन सेवाएं पूरी रात निष्क्रिय रहीं।
कागजों में अस्पताल और डॉक्टरों की मौजूदगी के बावजूद, ज़मीनी स्तर पर पूरी व्यवस्था नदारद दिखी। यह घटना राज्य सरकार के उन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है, जिनमें “सुलभ, सशक्त और संवेदनशील” स्वास्थ्य सेवाओं की बात कही जाती है। यदि मध्य प्रदेश को ‘स्वास्थ्य मॉडल’ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, तो एक महिला को खुले आसमान के नीचे प्रसव क्यों करना पड़ा?
सरकार भले ही स्वास्थ्य सेवाओं पर हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च करने और 108 एम्बुलेंस के चौबीसों घंटे संचालन का दावा करती हो, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों की वास्तविकता इन दावों की पोल खोलती है। या तो सरकारी दावे भ्रामक हैं, या फिर भ्रष्टाचार और लापरवाही ने व्यवस्था को खोखला कर दिया है।
मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता प्रवीन धौलपुरे ने इस मामले में स्वतंत्र और समयबद्ध जांच की मांग की है। उन्होंने एम्बुलेंस सेवाओं, सीएमएचओ और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की मांग की, साथ ही स्वास्थ्य मंत्री से यह भी पूछा कि बजट खर्च होने के बावजूद लाभ आम लोगों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा है। टॉर्च की रोशनी में जन्मा यह बच्चा, उन्होंने कहा, सरकार के विकास और संवेदनशील शासन के दावों के खिलाफ एक जीवित चार्जशीट है।
