संजय टाईगर रिजर्व से होना है 23 गांवों का विस्थापन

सीधी। संजय टाइगर रिजर्व में विस्थापन के लिए चिन्हित किए गए 54 गांवों में अब केवल 23 गांवों का ही विस्थापन होना है। 20 गांवों में पैकेज समेत विस्थापितों को सभी भुगतान किया जा चुका है। इनमें से काफी लोग अपना गांव छोडक़र अन्यत्र जा भी चुके हैं। कुछ ग्रामीण जाने की तैयारी में जुटे हुए हैं। वहीं 11 गांवों में विस्थापन पैकेज एवं भुगतान की प्रक्रिया चल रही है।

उधर संजय टाईगर रिजर्व क्षेत्र के कोर एरिया में विस्थापन न होने से इसका परिणाम वन्य प्राणियों के साथ ही कोर एरिया में बसे गांव के लोगों भी भुगतना पड़ रहा है। वन्य प्राणियों को जहां विचरण के लिए पर्याप्त स्थान नहीं मिल पा रहा है। वहीं विस्थापन के लिए चिन्हित गांवों में रहने वाले परिवारों को जंगली जानवरों के हमले का शिकार होना पड़ता है। बताते चलें कि संजय टाइगर रिजर्व अंतर्गत कोर जोन में बसे 54 गांवों को विस्थापन के लिए चिह्नित किया गया था। विभागीय दावों के अनुसार अब तक 20 गांवों का विस्थापन हो चुका है। पहला विस्थापन ग्राम कंजरा का वर्ष 2013-14 में हुआ था। इसके बाद क्रमश: कई गांव विस्थापित किए जा चुके हैं लेकिन करीब एक दर्जन को छोड़ दिया जाए तो सभी विस्थापित गांव पूरी तरह से इंसानी दखल से मुक्त नहीं हो पाए हैं। अभी भी कई विस्थापित गांवों के कुछ परिवार गांव छोडकर नहीं गए हैं। घर गिराने के बाद भी लोग झोपड़ी बनाकर रह रहे हैं और यहीं खेती बाड़ी का काम करते हैं।

विभागीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार विस्थापन में तेजी न आने का सबसे बड़ा कारण राजस्व विभाग का सहयोग न मिलना बताया जा रहा है। संजय टाइगर रिजर्व एरिया के विस्थापन के चिन्हित गांवों के विस्थापन की प्रक्रिया कछुए की गति से चल रही है। पहला गांव कंजरा वर्ष 2013-14 में विस्थापित हो गया था। उसके बाद से अब तक महज 20 और गांव विस्थापित हो पाए हैं। विस्थापन की प्रक्रिया धीमी गति से चलने के कारण विस्थापित गांवों में दुबारा बसाहट बढऩे लगी है। लोग गांव में झोपड़ी बनाकर रहते हैं। विस्थापन को लेकर सबसे बड़ी समस्या निर्धारित पैकेज राशि थी। शासन स्तर से मूल निवासी परिवार को विस्थापन के लिए 15 लाख रुपए का पैकेज निर्धारित किया गया था। तत्संबंध में जानकारों का कहना है कि संजय टाईगर रिजर्व क्षेत्र में विस्थापन की प्रक्रिया में सबसे बड़ी रुकावट क्षेत्रीय सियासत भी है। जब भी यहां विस्थापन की प्रक्रिया तेज की जाती है यहां फर्जी तौर पर बसे लोगों द्वारा तरह-तरह के हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए जाते हैं। उनकी पूरी नजर विस्थापन पैकेज एवं मुआवजा पर टिकी हुई है। जिले के जैव विविधतापूर्ण वन क्षेत्र को संरक्षित करने की दृष्टि से संजय दुबरी राष्ट्रीय उद्यान व टाइगर रिजर्व की स्थापना 1975 में की गई। सदाबहार साल वनों का यह क्षेत्र 152 पक्षी, 32 स्तनधारी, 11 सरीसृप, 3 उभयचर व 34 मत्स्य प्रजातियों समेत अनेक जीवों विशेषकर बाघों का आश्रय स्थल है। सफेद बाघों में सबसे प्रथम बाघ मोहन यहीं पाया गया था। बाघों के साथ ही यहां स्लोथ भालू, चीतल, नीलगाय, चिंकारा, सांभर, तेंदुआ, धोल, जंगली बिल्ली, हाइना, साही, गीदड़, लोमड़ी, भेडिया, पाइथन, चौसिंघा और बार्किंग डियर पाए जाते हैं।

इनका कहना है

संजय टाईगर रिजर्व से 23 गांवों का विस्थापन होना शेष है। वहीं 20 गांवों का भुगतान पूरी तरह से हो चुका है तथा 11 गांवों में भुगतान की प्रक्रिया चल रही है। हमारा प्रयास है कि विस्थापित गांवों के ज्यादा से ज्यादा लोग आगे आएं और भुगतान लेकर अन्यत्र बसाहट करें।

राजेश कन्ना टी, डीएफओ, संजय टाईगर रिजर्व सीधी

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