दावोस | स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम’ में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने विरोधियों को चौंकाते हुए खुद को ‘तानाशाह’ स्वीकार कर लिया। वैश्विक नेताओं द्वारा उनकी नीतियों को तानाशाही बताने पर पलटवार करते हुए ट्रंप ने कहा, “हाँ, मैं एक तानाशाह हूँ, लेकिन कभी-कभी व्यवस्था सुधारने के लिए दुनिया को एक तानाशाह की ज़रूरत होती है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके कड़े फैसले किसी विचारधारा या कट्टरता से नहीं, बल्कि व्यावहारिकता से प्रेरित होते हैं। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय में आया है जब वेनेजुएला और ग्रीनलैंड जैसे मुद्दों पर अमेरिकी रुख को लेकर पूरी दुनिया में उनकी तीखी आलोचना हो रही है।
अपने नेतृत्व कौशल का बचाव करते हुए ट्रंप ने कहा कि उनके द्वारा लिए गए निर्णय रूढ़िवादी या उदारवादी सोच का हिस्सा नहीं हैं। उन्होंने दावा किया कि उनकी नीतियों का 95 प्रतिशत हिस्सा केवल ‘कॉमन सेंस’ (साधारण समझ) पर आधारित होता है। ट्रंप के अनुसार, लोग उन्हें “भयानक तानाशाह” के रूप में देखते हैं क्योंकि वे पुराने और बेकार हो चुके अंतरराष्ट्रीय नियमों को तोड़ने का साहस रखते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनके भाषण को जबरदस्त सकारात्मक प्रतिक्रिया (रिव्यूज) मिली है, जो यह साबित करता है कि दुनिया अब बदलाव चाहती है।
दुनिया भर में बढ़ते तनाव के बीच ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि उनके इरादों को अक्सर गलत समझा जाता है। उन्होंने विशेष रूप से ग्रीनलैंड के संदर्भ में कहा कि लोगों को लगता है कि वे सैन्य बल का प्रयोग करेंगे, लेकिन उनकी ऐसी कोई मंशा नहीं है। उन्होंने कहा, “मुझे बल प्रयोग करने की ज़रूरत नहीं है और न ही मैं ऐसा करना चाहता हूँ।” ट्रंप ने कूटनीतिक और आर्थिक दबाव को अपना प्राथमिक हथियार बताया। हालांकि, उनके “तानाशाह” वाले संबोधन ने कई लोकतांत्रिक देशों की चिंता बढ़ा दी है, जिसे कूटनीतिज्ञ वैश्विक व्यवस्था के लिए एक नया जोखिम मान रहे हैं।

