जबलपुर: मप्र हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने अपने एक आदेश में कहा कि परिवारों के नौनिहाल दंपति के कलह का खामियाजा भुगतने विवश होते हैं। जिस कारण कुटुम्ब न्यायालय का वह आदेश अनुचित पाते हुए निरस्त किया जाता है, जिसके जरिए तीन वर्षीय मासूम को पिता से मिलने की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने कुटुम्ब न्यायालय जबलपुर के आदेश पर ऐतराज करते हुए कहा कि महज आधे वाक्य में यह लिख देना कि पिता अपने बच्चे से मिलना नहीं चाहता, इसलिए कोर्ट किसी को मजबूर नहीं कर सकता। वस्तुत: ऐसा आदेश स्वीकार्य नहीं है। जिस कारण ऐसे आदेश पर मुहर नहीं लगाई जा सकती। कुटुम्ब न्यायालय को निर्देश दिया जाता है कि वह आवेदन का गुण-दोष के आधार पर पुन: विचार कर नए सिरे से आदेश पारित करे।
हाईकोर्ट ने अभिलेख का अवलोकन करने के उपरांत अपने आदेश में कहा कि तलाक के मुकदमे पति-पत्नी के बीच मानसिक पीड़ा तो पैदा करते ही हैं, लेकिन सबसे अधिक तनाव बच्चों को सहना पड़ता है। बचपन में मिला मानसिक आघात उनके भविष्य के व्यवहार और व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि जब बच्चा पिता से मिलने की जिद कर रहा था, तब फैमिली कोर्ट को पति.पत्नी की काउंसिलिंग करानी चाहिए थी या किसी प्रशिक्षित मीडिएटर की मदद लेनी चाहिए थी।
दरअसल, राजधानी भोपाल निवासी महिला ने अपने पति के विरुद्ध हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। पति ने पहले कुटुम्ब न्यायालय में विवाह विच्छेद का प्रकरण दायर किया था जो बाद में भोपाल स्थानांतरित हो गया। दंपति का तीन वर्ष का बच्चा फिलहाल मां के साथ रह रहा है। बच्चे ने अपने पिता से मिलने की इच्छा जताई, लेकिन पिता मिलने से इनकार कर रहा था। इस पर महिला ने कुटुम्ब न्यायालय में आवेदन दिया, जिसे नौ अप्रैल 2025 को निरस्त कर दिया गया। इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट के समक्ष पति ने दलील दी कि पत्नी पहले बच्चे से कहती थी कि उसके पिता की मृत्यु हो चुकी है। अब जबलपुर से भोपाल बुलाने की मंशा से बच्चें को आधार बनाकर यह आवेदन किया गया है।
