संस्कृत के छात्र 10वीं के बाद साढ़े सात साल में बनेंगे आयुर्वेदिक चिकित्सक

नयी दिल्ली, 13 जनवरी (वार्ता) संस्कृत भाषा में शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र अब 10वीं कक्षा के बाद साढ़े सात साल के नये पाठ्यक्रम में प्रवेश लेकर आयुर्वेदिक चिकित्सक बन सकेंगे। यह पाठ्यक्रम संस्कृत के प्रतिभाशाली छात्रों को आयुर्वेदिक चिकित्सक बनाने के साथ प्राचीन आयुर्वेद चिकित्सा का संस्थागत रूप से स्थापित करने का प्रयास है।

यह जानकारी मंगलवार को केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.श्रीनिवास वरखेड़ी और राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति आयोग (एनसीआईएसएम) की अध्यक्ष डॉ. मनीषा कोठेकर ने आयुर्वेद गुरुकुल संबद्धता पोर्टल और आयुर्वेद गुरुकुलों हेतु विस्तृत दिशा-निर्देशों के औपचारिक शुभारम्भ के अवसर पर दी।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली स्थित केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के सारस्वत सभागार में आयोजित कार्यक्रम में पोर्टल एवं दिशा-निर्देशों का विमोचन किया गया। केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय इस पाठ्यक्रम के लिये नोडल एजेंसी रूप में कार्य करेगा। जिसमें इस पोर्टल के माध्यम से देशभर की संस्थायें आयुर्वेद गुरुकुलम् के लिये ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगे। इस पोर्टल में पंजीकरण, निरीक्षण एवं संबद्धता की पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी, सुव्यवस्थित और पूरी तरह से डिजिटल है, जिससे गुरुकुल आधारित आयुर्वेद शिक्षा को एक सशक्त राष्ट्रीय नियामक ढांचा प्राप्त होगा।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि डॉ. मनीषा कोठेकर ने कहा कि यह पहल आयुर्वेद में शास्त्रीय प्रामाणिकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं पारदर्शिता को नई दिशा देगी। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद का संस्कृत से गहरा संबंध है और संस्कृत के बिना आयुर्वेद दर्शन, शरीर-विज्ञान और चिकित्सा सिद्धांतों को समग्र रूप से समझना संभव नही है। यह पाठ्यक्रम भारतीयता, आधुनिक तकनीक, कौशल विकास और तत्त्वज्ञान के समन्वय से विद्यार्थियों को समग्र शिक्षा प्रदान करेगा। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद के प्रति वैश्विक रुचि बढ़ रही है और गुरुकुल आधारित मॉडल भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करेगा।

कुलपति प्रो. वरखेड़ी ने कहा कि आयुर्वेद केवल चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि जीवन शैली है, जिसकी जड़ें संस्कृत शास्त्रों में निहित हैं। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप यह पहल परंपरा एवं नवाचार के संतुलन का सशक्त उदाहरण है। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद, संस्कृत, दर्शन, योग और संहिता ये सभी एक-दूसरे के पूरक हैं और गुरुकुल प्रणाली के माध्यम से इनका समन्वित अध्ययन संभव हो सकेगा।

श्री वरखेड़ी ने बताया कि केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय एनईईटी (नीट) की तर्ज पर प्रारंभिक बीएएमएस प्रारंभिक आयुर्वेद कार्यक्रम की प्रवेश परीक्षा पीएपी नीट आयोजित करेगा। इस परीक्षा के माध्यम से छात्रों को प्रवेश प्रदान किया जाएगा। उन्होंने बताया कि आयुर्वेद गुरुकुलों को मान्यता प्रदान करने का अधिकार भी केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के पास रहेगा।

श्री वरखेड़ी ने बताया कि इसके अलावा विश्वविद्यालय भी अपने परिसरों में आयुर्वेद गुरुकुलम् कार्यक्रम प्रारम्भ करेगा। प्रथम चरण में यह कार्यक्रम नासिक परिसर सहित दिल्ली और अन्य परिसर में शुरू किया जाएगा। यह पहल एनसीआईएसएम के प्रारंभिक आयुर्वेद कार्यक्रम बीएएमएस ढांचे (फ्रेमवर्क) के अंतर्गत संचालित किया जायेगा, जिसके लिये 7 वर्ष 6 माह की समेकित अवधि का पाठ्यक्रम निर्धारित किया गया है। उन्होंने बताया कि इसमें दो साल का प्रारंभिक–आयुर्वेद कार्यक्रम, साढ़े चार साल का बीएएमएस पाठ्यक्रम और एक साल की अनिवार्य प्रशिक्षण (इंटर्नशिप) सम्मिलित होगी। इस व्यवस्था के अंतर्गत अब संस्कृत पृष्ठभूमि के छात्र भी आयुर्वेद चिकित्सक बन सकेंगे।

श्री वरखेड़ी ने कहा कि केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय एवं एनसीआईएसएम के सहयोग से शुरू की गई यह पहल गुरुकुल आधारित आयुर्वेद शिक्षा के लिए एक मजबूत, विश्वसनीय एवं भविष्य उन्मुख राष्ट्रीय मॉडल स्थापित करेगी तथा संस्कृत एवं आयुर्वेद की शास्त्रीय परंपरा को पुनर्जीवित करते हुए भारत की ज्ञान परंपरा को वैश्विक मंच पर सशक्त रूप से प्रतिष्ठित करेगी।

इस अवसर पर कुलसचिव प्रो. आरजी मुरली कृष्ण, राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.मदन मोहन झा, शैक्षणिक अधिष्ठाता प्रो. ललित कुमार त्रिपाठी, छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रो. लीना सक्करवाल तथा आयुर्वेद आईकेएस के समन्वयक डॉ. डी. दयानाथ उपनिदेशक शैक्षणिक डॉ. देवानंद शुक्ल सहित अनेक शिक्षाविद्, अधिकारी एवं विशेषज्ञ उपस्थित रहे।

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