जबलपुर: मप्र हाईकोर्ट में प्रदेश के कर्मचारियों को प्रमोशन मामले में हस्तक्षेपकर्ताओं के द्वारा तर्क प्रस्तुत किया गया। अजाक्स की तरफ से तर्क दिया गया कि प्रमोशन में व्यवहारिक तथा सैद्धान्तिक तौर पर क्रीमी लेयर लागू नहीं किया जा सकता है। हाईकोर्ट जस्टिस संजीव सचदेवा तथा जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ ने याचिका पर अगली सुनवाई 13 जनवरी को निर्धारित की है।
गौरतलब है कि भोपाल निवासी डॉ. स्वाति तिवारी व अन्य तरफ से दायर याचिकाओं में मध्य प्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम 2025 को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया था कि वर्ष 2002 के नियमों को हाईकोर्ट के द्वारा समाप्त किया जा चुका है। इसके विरुद्ध मप्र शासन ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए हैं।
सुप्रीम कोर्ट में मामला अभी लंबित है। इसके बावजूद मप्र शासन ने महज नाम मात्र का शाब्दिक परिवर्तन कर पूर्व के नियम लागू कर दिये है। सरकार की तरफ से दलील दी गयी थी कि नियम बनाने के पहले सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों के अनुरूप बनाई गई है। नियम बनाते समय क्वांटिफायर डाटा का परीक्षण तथा कर्मचारियों की प्रशासनिक क्षमता का आकलन भी किया गया।
सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार कमेटी गठित कर कैडर वॉइस डाटा का परीक्षण करने के बाद पद आरक्षित किये गये है।याचिका पर मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान अजाक्स संघ की तरफ से तर्क दिया गया कि प्रमोशन नियम 2025 के नियम 11(1,2,3) सहित अन्य नियम पूर्णतः असंवैधानिक है। नियम में सर्व प्रथम आरक्षित वर्ग की ग्रेडेशन लिस्ट बनाने तथा मेरिट के आधार पर पदोन्नति हुए आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों की गणना का प्रावधान है। एससी-एसटी वर्ग के लिए मेरिट पर प्रमोशन से संबंधित कोई भी प्रावधान नियमों में मौजूद नहीं है।
प्रमोशन के नियमों में क्रीमीलेयर को सैद्धांतिक व व्यवहारिक रूप से लागू किया जा सकता है। मध्य प्रदेश के समस्त विभागों में मौजूद कर्मचारी के प्रस्तुत डाटा के मुताबिक आरक्षित वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। एससी-एसटी वर्ग मध्य प्रदेश में कुल आबादी 36 प्रतिशत है। उच्च पदों पर उनका प्रतिनिधित्व 7 से 18 प्रतिशत है। अजाक्स संघ की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉक्टर के. एस. चौहान वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने पक्ष रखा।
