वेनेजुएला का घटनाक्रम केवल किसी एक देश की आंतरिक राजनीतिक उठापटक नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के उस नंगे यथार्थ को उजागर करता है, जहां संसाधन,विशेषकर तेल,अक्सर लोकतंत्र, संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून से कहीं अधिक निर्णायक साबित होते हैं. वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी ने यही कठोर सत्य एक बार फिर सामने ला दिया है कि वैश्विक भू-राजनीति में ‘हस्तक्षेप’ अक्सर मानवीय चिंता या लोकतांत्रिक मूल्यों के नाम पर होता है, लेकिन उसके पीछे ऊर्जा-सुरक्षा और भू-आर्थिक हित अधिक प्रबल होते हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा मादुरो को ‘नार्को-टेररिज्म’ के आरोपों में पकडक़र बाहर ले जाने और वेनेजुएला के ‘अस्थायी संचालन’ की घोषणा न केवल अंतरराष्ट्रीय कानून की सीमाओं को चुनौती देती है, बल्कि यह प्रश्न भी उठाती है कि किसी संप्रभु राष्ट्र की राजनीतिक व्यवस्था तय करने का अधिकार आखिर किसे है. यह अमेरिका के दादागिरी नहीं है तो क्या है ? दरअसल,यह कार्रवाई संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंचों की प्रासंगिकता पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है. यदि कोई शक्तिशाली देश अपनी सैन्य क्षमता के बल पर किसी सरकार को अपदस्थ कर सकता है, तो फिर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की वैधता और संतुलन का क्या अर्थ रह जाता है ? वेनेजुएला की सुप्रीम कोर्ट द्वारा उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज को कार्यवाहक राष्ट्रपति नियुक्त करना और इसे ‘संप्रभुता की रक्षा’ के रूप में प्रस्तुत करना, इस बात का संकेत है कि देश की संस्थाएं इस हस्तक्षेप को आक्रमण के रूप में देख रही हैं. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या वेनेजुएला की थकी-हारी अर्थव्यवस्था और विभाजित समाज इस टकराव को संभाल पाएगा?
घटनाक्रम का आर्थिक आयाम कहीं अधिक व्यापक है. वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े सिद्ध तेल भंडारों में से एक का मालिक है. ऐसे में अमेरिकी नेतृत्व द्वारा ‘तेल संसाधनों के उपयोग’ के संकेत वैश्विक तेल राजनीति के इरादों को साफ करते हैं. अभी तक तेल अवसंरचना को बड़ा नुकसान नहीं पहुंचा है, लेकिन अनिश्चितता और अस्थिरता वैश्विक बाजारों में दहशत पैदा करने के लिए पर्याप्त है. रूस और चीन द्वारा हस्तक्षेप की निंदा और कुछ पश्चिमी देशों द्वारा इसे ‘लोकतंत्र की बहाली’ बताना, विश्व राजनीति के ध्रुवीकरण को भी जाहिर करता है.
इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ी चिंता आम नागरिकों की है. वेनेजुएला पहले ही आर्थिक संकट, महंगाई, पलायन और सामाजिक तनाव से जूझ रहा है. अब सैन्य हस्तक्षेप और सत्ता संघर्ष ने वहां के नागरिकों को और अधिक असुरक्षा में धकेल दिया है. क्या यह स्थिति देश को गृह-संघर्ष की ओर ले जाएगी ? या फिर सेना किसी बाहरी संरक्षित सत्ता-हस्तांतरण के आगे झुकेगी,यह आने वाला समय तय करेगा.
भारत जैसे लोकतांत्रिक और उभरती शक्ति वाले देश के लिए इस घटना से कई सबक निकलते हैं. पहला,वैश्विक राजनीति में नैतिकता और शक्ति के बीच संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है. दूसरा,संसाधन-आधारित भू-राजनीति आने वाले वर्षों में और तीव्र होने वाली है. और तीसरा,अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था तभी सार्थक होगी, जब संप्रभुता, संवाद और मानवता को सैन्य ताकत से ऊपर रखा जाएगा. वेनेजुएला का संकट केवल उसका नहीं, बल्कि वह आईना है जिसमें दुनिया को अपने ‘वैश्विक न्याय’ के दावों की सच्चाई देखनी होगी. अगर तेल के लिए हथियार ही अंतिम निर्णायक बनते रहे, तो लोकतंत्र और मानवाधिकार केवल भाषणों की शब्दावली बनकर रह जाएंगे.
