ग्वालियर:अद्भुत नवग्रह मंदिर एवं एशिया का सबसे बड़ा मंदिर ग्वालियर से 45 किमी दूर डबरा में बनाया गया है। इसे अद्भुत इसलिये कहा जा रहा है कि एक मात्र ऐसा नवग्रह मंदिर है जहां नवग्रह के साथ -साथ उनकी पत्नियां भी विराजमान है। 12 एकड़ जमीन पर सिर्फ मंदिर बनाया गया है।यह मंदिर सनातन धर्म परंपरा, वास्तु शास्त्र और ज्योतिषशास्त्र के आधार पर 108 खंभों पर स्थापित किया है।
हिन्दूधर्म में 108 अंक विशेष महत्व रखते हैं। 27 तारामण्डल जिनको नक्षत्र भी कहा जाता है। हर नक्षत्र की 4-4 दिशायें होती है जिनका योग 108 होता है। मंदिर में नवग्रह की स्थापना बहुत अध्ययन के बाद की गयी है। हर मंदिर और ग्रगह को ऐसे स्थान दिया है कि कभी वह एक-दूसरे के सामने न आ सके। सूर्य मंदिर की स्थापना के साथ उनके तेज को नियंत्रित करने के लिये पानी का तालाब, नालियां व झरोखे बनाये गये हैं।
मंदिर के साथ ही पर्यटन नक्शे पर ग्वालियर का डबरा उभरकर आया है। ग्वालियर से ओरछा जाने वाले डबरा में भी नवग्रह मंदिर, दतिया में मां पीताम्बरा पीठ और ओरछा जायेंगे। अगले माह 11 से 20 फरवरी के बीच मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा प्रस्तावित है।वैदिक धर्मग्रंथों एवं शास्त्रों में उल्लेख किया गया है कि संपूर्ण ब्रह्मांड में कुल 27 तारांमंडल है। इन तारामंडलों की 4 दिशायें है ।
यदि हम 27 को 4 से गुणा करें तो कुल 108 संख्या आती है। जिसका अर्थ यह है कि संपूर्ण ब्रम्हमांण का स्वरूप 108 अंक है। संख्या 108 को हर्षद संख्या माना गया है। जो अपने अंकों के योग स विभाज्य एक पूर्णांक है। संस्कृत में हर्षद का अर्थ है ‘‘महान आनंद’’। 108 प्रतिच्छेदित उर्जा रेखांये है जो मिलकर हृदय चक्र बनाती है। इसी सोच के साथ 12 एक़ में 108 पिलरों पर यह मंदिर स्थापित है।
