जबलपुर: धान मिलिंग और परिवहन को लेकर शासन– प्रशासन की दोहरी नीति उजागर हो गई है। एक ओर जिले की राइस मिलों पर ओवरलोडिंग के नाम पर कार्रवाई और जांच चल रही है, वहीं दूसरी ओर अंतर-जिला धान भेजने वाले ट्रकों में खुलेआम क्षमता से अधिक धान लोड किया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि गेट पास और कांटा पर्ची की पूरी जानकारी प्रशासन के पास होने के बावजूद कोई रोकथाम नहीं की जा रही।
मंगलवार को जबलपुर से इंदौर भेजी गई धान की रैक की लोडिंग ट्रकों से की गई, जिसमें स्पष्ट रूप से ओवरलोडिंग हुई। इससे प्रशासन पर भेदभाव के आरोप भी लग रहे हैं। यदि शासन और प्रशासन नियमों को समान रूप से लागू करे और ओवरलोडिंग पर किसी को छूट न मिले, तो जिले को होने वाला आर्थिक नुकसान भी रुकेगा। वर्तमान हालात में नियमों की अनदेखी और दोहरी नीति से नुकसान की आशंका लगातार बढ़ रही है।
इंदौर में मिलिंग, जबलपुर को भारी चपत
वर्ष 2024-25 की खरीदी गई करीब 15 लाख क्विंटल धान अब भी जबलपुर के वेयरहाउस में रखी है। मिलिंग का काम जबलपुर के बजाय इंदौर और उज्जैन की मिलों को दिया गया है। करीब 1 लाख क्विंटल धान इंदौर पहुंचाने के लिए पांच मालगाड़ियों के फेरे लगाने पड़ेंगे। प्रत्येक फेरे पर रेलवे को 26 लाख रुपये का किराया देना होगा।
धान को वेयरहाउस से कछपुरा यार्ड, फिर इंदौर रेलवे यार्ड और वहां से मिल तक पहुंचाने में करीब 260 रुपये प्रति क्विंटल खर्च आ रहा है। यदि यही काम जबलपुर में होता तो नागरिक आपूर्ति निगम (नान) को करीब 2.6 करोड़ रुपये की बचत होती।
जांच में फंसे 43 मिलर, काम बाहर की मिलों को
जबलपुर के 46 मिलरों में से 43 पर एफआईआर और जांच लंबित है। इनमें से करीब 27 मामलों में विभागीय जांच पिछले छह महीनों से अटकी हुई है। केवल तीन मिलर ही फिलहाल काम कर रहे हैं। इस बीच बाहर के जिलों के मिलरों को जबलपुर की धान की मिलिंग का काम दिया जा रहा है, जिस पर पहले भी सवाल उठ चुके हैं।
