
आशीष कुर्ल भोपाल। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को लेकर दिए गए बयान ने कांग्रेस के भीतर बहस छेड़ दी है। सिंह ने आरएसएस और भाजपा की संगठनात्मक क्षमता की सराहना की, वहीं उनकी विचारधारा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति अपना विरोध भी स्पष्ट रूप से दोहराया।
दिग्विजय सिंह की सोशल मीडिया पर यह टिप्पणी उस तस्वीर के संदर्भ में आई, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के पास ज़मीन पर बैठे दिखाई दे रहे हैं। इस तस्वीर का उल्लेख करते हुए सिंह ने कहा कि आरएसएस–भाजपा का संगठनात्मक ढांचा जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को तैयार कर उन्हें सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने में सक्षम है। अपने रुख को स्पष्ट करते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा, “मैं संगठन की सराहना करता हूं, लेकिन आरएसएस और मोदी जी की विचारधारा का सदैव मुखर विरोधी रहा हूं। मैंने संगठन की प्रशंसा की है, न कि उनकी विचारधारा की।
सिंह के इस बयान पर कांग्रेस के भीतर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा ने सवाल उठाया कि नाथूराम गोडसे से जुड़े संगठन से गांधीवादी विचारधारा पर आधारित कांग्रेस क्या सीख सकती है। कई अन्य नेताओं ने भी सिंह की टिप्पणी से दूरी बनाते हुए कांग्रेस और आरएसएस के बीच वैचारिक अंतर को रेखांकित किया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दिग्विजय सिंह की टिप्पणी कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक कमजोरी और आंतरिक असंतोष की ओर इशारा करती है। दो बार मुख्यमंत्री रह चुके और 5 दशक से पार्टी से जुड़े सिंह को जमीनी स्तर पर संगठन की कमजोर पकड़ को लेकर चिंतित माना जा रहा है। उनका यह बयान वैचारिक समर्थन से अधिक संगठनात्मक सुधार की अपील के रूप में देखा जाना चाहिए। उनका तर्क है कि संगठनात्मक दक्षता और विकेंद्रीकृत नेतृत्व जैसे पहलुओं से कांग्रेस व्यावहारिक सबक ले सकती हैं ।
दिग्विजय सिंह के अनुसार संदेश साफ है—वैचारिक विरोध के बावजूद प्रतिद्वंद्वी की संगठनात्मक ताकत से सीख लेने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। ऐसा करने से कांग्रेस के ज़मीनी कार्यकर्ता को मजबूती मिलेगी एवं नई पीढ़ी को तैयार किया जा सकेगा जो कांग्रेस का झंडा बुलंद कर विपक्ष से बेहतर लड़ाई लड़ पायेगी।
