नयी दिल्ली, 27 दिसंबर (वार्ता) समाप्ति की ओर अग्रसर वर्ष 2025 भारतीय अर्थव्यवस्था में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर प्रणाली में अभूतपूर्व सुधारों का साक्षी बना और तमाम वैश्विक चुनौतियों तथा पश्चिमी सीमा पर पड़ोसी देश के साथ सैन्य टकराव के बीच लंबे समय बाद एक दुर्लभ स्थिति बनी है जहां अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण संकेतक पूरी तरह अनुकूल हैं। इस समय दुनिया के सबसे बड़े बाजार अमेरिका में सर्वोच्च 50 प्रतिशत के आयात शुल्क का सामना कर रही भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर पिछली दो तिमाहियों में औसतन आठ प्रतिशत के स्तर पर है। इसके साथ ही मुद्रास्फीति एक दशक के निचले स्तर पर है और रिजर्व बैंक की नीतिगत दरें भी इस साल लगातार नीचे आ रही हैं। डॉलर की तुलना में रुपये की विनिमय दर में गिरावट के बावजूद चालू खाते का घाटा सीमित है और विदेशी मुद्रा भंडार 700 अरब डॉलर के करीब मजबूत बना हुआ है। वैश्विक एजेंसियों और विश्लेषकों ने भारतीय अर्थव्यवस्था की इस वर्तमान स्थिति का श्रेय देश में आर्थिक सुधारों में निरंतरता और राजकोषीय तथा मौद्रिक नीति में तालमेल को दिया है। यही कारण है कि चालू वित्त वर्ष में प्रमुख वैश्विक रेटिंग एजेंसियों ने विदेशी ऋणों के लिए भारत की साख में सुधार किये हैं।
भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और जल्द ही तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है। आर्थिक गतिविधियों में तेजी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विनिर्माण और सेवा क्षेत्र के खरीद प्रबंधक सूचकांक (पीएमआई) 50 से ऊपर बने हुए हैं। दिसंबर के पहले सप्ताह में जारी आंकड़ों के अनुसार, नवंबर में विनिर्माण क्षेत्र का पीएमआई 55.7 और सेवा क्षेत्र का 59.1 था। अगस्त में देश के सबसे बड़े निर्यात बाजार अमेरिका में भारतीय उत्पादों पर दो बार में कुल 50 प्रतिशत का दंडात्मक आयात शुल्क लगाने के बाद पूंजी और वित्त बाजार में गहरी चिंता व्याप्त हो गयी थी। इसके अलावा, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संकट के प्रभाव बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने जुलाई-सितंबर तिमाही में 8.2 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल की जो जनवरी-मार्च 2024 के बाद सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा है। घरेलू अर्थव्यवस्था में गतिविधियां पिछली चार तिमाहियों से निरंतर बढ़ रही हैं। इस साल जनवरी-मार्च में जीडीपी वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत और अप्रैल-जून में 7.8 प्रतिशत रही थी। भारत पिछले कई वर्षों से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है।
सरकार ने वैश्विक चुनौतियों के बीच घरेलू मांग को प्रोत्साहित करने वाले एक बड़े कदम के तहत 22 सितंबर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) दरों में बड़ी कटौती का निर्णय लागू किया। जीएसटी परिषद ने तीन सितंबर की बैठक में इस अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में बुनियादी सुधार करते हुए इसे चार स्लैब की जगह दो स्लैब में पुनर्गठित करने का ऐतिहासिक फैसला किया। इसके तहत 28 और 12 प्रतिशत की दरों को समाप्त कर इन स्लैब की अधिकतर वस्तुओं को 18 प्रतिशत और पांच प्रतिशत की दरों में स्थानांतरित कर दिया गया। वहीं, विलासिता और स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाली वस्तुओं के लिए 40 प्रतिशत की एक विशेष दर रखी गयी है। उद्योग और व्यापार जगत ने इस निर्णय को ऐतिहासिक करार देते हुए इसे उद्योग और उपभोक्ताओं दोनों के लिए स्वागत योग्य बताया। जीएसटी परिषद के इस निर्णय से 90 प्रतिशत से अधिक वस्तुओं पर कर की दरों में कमी आयी है।
जीएसटी में सुधार का संकेत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त के लाल किले के अपने भाषण में ही दे दिया था। लोगों ने उसके इंतजार में बड़ी खरीद “दीवाली के तोहफे” तक के लिए रोक रखे थे। कर में छूट से इस वर्ष त्योहारी खरीद में रिकॉर्ड वृद्धि देखी गयी। सितंबर और अक्टूबर के त्योहारी सीजन में इस बार रिकॉर्ड तोड़ खरीद दर्ज की गयी। दरों में कमी के बावजूद नवंबर में सकल जीएसटी संग्रह पिछले साल नवंबर से 0.75 प्रतिशत बढ़कर 1.70 लाख करोड़ रुपये रहा। चालू वित्त वर्ष में नवंबर तक जीएसटी संग्रह में वार्षिक आधार पर औसत वृद्धि 8.9 प्रतिशत चल रही है। अप्रत्यक्ष कर में इस बड़े सुधार से पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने फरवरी में बजट पेश करते हुए मध्य वर्गीय आयकर दाताओं को बड़ी राहत देते हुए 12 लाख रुपये तक की वार्षिक आय को करमुक्त कर दिया। यह आयकर में किसी एक वर्ष में अब तक की सबसे बड़ी राहत है। उन्होंने इसके साथ ही 1961 के आयकर अधिनियम की जगह नया कर अधिनियम लाने के लिए विधेयक लाने की घोषणा की थी। आयकर विधेयक, 2025 को संसद के बजट सत्र में 21 अगस्त 2025 को मंजूरी मिल चुकी है। यह अधिनियम नये वित्त वर्ष पर एक अप्रैल 2026 से प्रभावी हो जायेगा।
वित्त मंत्री ने इस विधेयक को लोकसभा में पेश करते हुए कहा था कि इसमें कर की कोई नयी दर लागू नहीं की जा रही है बल्कि पुराने कानून को सरल भाषा में प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि करदाता, पेशेवर और कर प्रशासन से जुड़े लोगों के लिए उसे समझना और उसका अनुपालन करना आसान हो सके। इसमें धाराओं की संख्या पुराने कानून की 819 की तुलना में 536 कर दी गयी है और अध्याय भी 47 की जगह केवल 23 हैं।
सरकार के इन उपायों के परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था इस समय तीव्र वृद्धि के बावजूद निम्न मुद्रास्फीति का सुखद अनुभव कर रही है। जीएसटी सुधारों के बाद उपभोक्ता मूल्य आधारित खुदरा मुद्रास्फीति अक्टूबर में 0.25 प्रतिशत और नवंबर में 0.71 प्रतिशत दर्ज की गयी। यह रिजर्व बैंक के लिए निर्धारित दायरे से काफी नीचे है। सरकार ने रिजर्व बैंक को खुदरा मुद्रास्फीति लंबी अवधि में चार प्रतिशत के आसपास और मोटे तौर पर मासिक मुद्रास्फीति की दर दो से छह प्रतिशत के बीच रखने की जिम्मेदारी दी है। मुद्रास्फीति एक ऐसे दौर में कम है जबकि डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर पर दबाव है तथा रिजर्व बैंक ब्याज दरों को कम करने और बैंकों के पास नकदी प्रवाह बढ़ाने की नीति पर चल रहा है। महंगाई में कमी से निवेश और उपभोग मांग पर अनुकूल असर पड़ा है। विश्व बाजार की चुनौतियों का बावजूद अप्रैल-नवंबर 2025 में वस्तु एवं सेवाओं का कुल निर्यात सालाना आधार पर 5.43 प्रतिशत बढ़कर 562.13 अरब डॉलर पर पहुंच गया। कुल आयात पांच प्रतिशत बढ़कर 651.13 अरब डॉलर पर पहुंच गया। इस दौरान वाणिज्यिक वस्तुओं का निर्यात सालाना आधार पर 2.62 प्रतिशत की वृद्धि के साथ ऊंचा बना रहा। सेवाओं के निर्यात में 8.65 प्रतिशत की वृद्धि हुई। सेवा क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था की वृद्धि का सबसे मजबूत इंजन बना हुआ है।
चालू वित्त वर्ष में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) मजबूत बना रहा और अप्रैल-सितंबर 2025 के दौरान सीधे 50.36 अरब डॉलर की शेयर पूंजी भारत में आयी। यह सालाना 16 प्रतिशत की वृद्धि है और अब तक किसी भी छमाही में एफडीआई का सबसे बड़ा आंकड़ा है। पिछले वित्त वर्ष में 81 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया था।
सेवा निर्यात के मजबूत प्रदर्शन और एफडीआई के प्रवाह से बाह्य क्षेत्र में देश की स्थिति मजबूत बनी हुई है और चालू खाते का घाटा पहली छमाही में अप्रैल से सितंबर के दौरान 15 अरब डॉलर रहा जो जीडीपी का 0.8 प्रतिशत है। पिछले साल इसी अवधि में यह जीडीपी के 1.3 प्रतिशत पर रहा था। पिछले साल के अंत में विदेशी मुद्रा भंडार 640 अरब डॉलर पर था जो इस साल 700 अरब डॉलर के पार पहुंचने के बाद फिलहाल करीब 693 अरब डॉलर से ऊपर है।
रुपया इस समय दबाव में है और चालू वित्त वर्ष में 5.7 प्रतिशत टूट चुका है। इस महीने एक बार भारतीय मुद्रा 91 रुपये प्रति डॉलर से भी नीचे उतर गयी थी।
चुनौतियों के बीच सुधारों को जारी रखते हुए सरकार ने आर्थिक सुधारों की रफ्तार बनाये रखी है। वर्ष के दौरान कर सुधारों के अलावा श्रम बाजार, जहाजरानी, परमाणु ऊर्जा और बीमा क्षेत्रों में निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए पुराने कानूनों में बदलाव किये गये हैं जिससे आने वाले समय में इन क्षेत्रों में रोजगार में भी तेजी आने की उम्मीद है। सरकार ने सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्यमों की परिभाषा में सुधार कर अधिकतम निवेश की सीमा ढाई गुना और कारोबार की सीमा दोगुना कर दी है। इससे उन्हें कारोबार के विस्तार के लिए प्रोत्साहित किया जा सकेगा।
जहाजरानी, बंदरगाह और समुद्र आधारित अर्थव्यवस्था को नयी गति देने के लिए संसद के मानसून सत्र में पांच विधेयकों को मंजूरी दी गयी। ये विधेयक मर्चेंट शिपिंग, तटवर्तीय पोत परिवहन, समुद्री मार्ग से आवाजाही और जहाजी माल के बिलों की व्यवस्था में सुधार से जुड़े हैं।
दिसंबर में शीतकालीन सत्र में परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी क्षेत्र के निवेश और मॉड्युलर छोटे रिएक्टरों की स्थापना की राह खोलने वाले ‘शांति’ विधेयक, 2025 को मंजूरी दी गयी। सरकार का कहना है कि इससे साल 2070 तक कार्बन उत्सर्जन के मामले में ‘नेट जीरो’ का लक्ष्य हासिल करने की देश की प्रतिबद्धता को पूरा करने में मदद मिलेगी।
सरकार ने बीमा कानून में संशोधन कर इस क्षेत्र में विदेशी निवेशकों को शत-प्रतिशत हिस्सेदारी वाली कंपनी स्थापित करने की छूट दे दी है। इसमें बीमा कंपनी और गैर-बीमा कंपनी के विलय के प्रावधान भी रखे गये हैं।
निर्यात क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के उपायों को आगे बढ़ाते हुए सरकार ने जहां विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ कई मुक्त व्यापार समझौते किये हैं, वहीं अमेरिकी शुल्कों से निपटने के लिए नवंबर में 25,600 करोड़ रुपये का पैकेज दिया है जिसके तहत कपड़ा, चमड़ा, रत्नाभूषण, इंजीनियरिंग सामान और समुद्री उत्पादों के निर्यातकों को प्राथमिकता के आधार पर सहायता दी जायेगी ताकि वे बाजार विविधिकरण कर अपने कारोबार और नौकरियों को बचाये रख सकें।

