डिजिटल सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम

मध्य प्रदेश में ‘ई-जीरो एफआईआर’ व्यवस्था की शुरुआत केवल एक तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि पुलिस व्यवस्था की उस सोच में बदलाव का संकेत है जिसमें पीडि़त को केंद्र में रखकर नीतियां बनाई जा रही हैं. ग्वालियर में आयोजित ‘अभ्युदय मध्य प्रदेश ग्रोथ समिट’ के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा लॉन्च किया गया यह पोर्टल साइबर अपराध से जूझते आम नागरिकों को बड़ी राहत देने वाला है. आज जब ठगी के तरीके बदल रहे हैं, अपराधियों का नेटवर्क राज्य की सीमाओं से बहुत आगे तक फैला है, ऐसे में थाना-क्षेत्राधिकार की परंपरागत बाधाओं को तोडऩे वाली यह पहल समय की मांग कही जा सकती है. जीरो एफआईआर का विचार पहले भी मौजूद था, पर इसका लाभ सीमित दायरे तक ही पहुंच पाता था. साइबर ठगी की शिकायत करने वाले अधिकतर लोग ना केवल थाने से थाने भटकते थे, बल्कि कई मामलों में देरी के कारण पैसा वापस पाने की संभावना भी खत्म हो जाती थी. ऐसे में ‘ई-जीरो एफआईआर’ का डिजिटल स्वरूप व्यवस्था में गति और जवाबदेही लाने का एक सशक्त माध्यम बन सकता है. मध्य प्रदेश द्वारा इसे व्यावहारिक रूप देकर लागू करना स्वागत योग्य कदम है. विशेष रूप से यह तथ्य उल्लेखनीय है कि 1 लाख रुपए से अधिक की साइबर वित्तीय धोखाधड़ी पर सिस्टम स्वत: एफआईआर दर्ज कर लेगा. इससे उन मामलों में तुरंत कार्रवाई संभव होगी, जहां हर मिनट की देरी अपराधियों को फायदा पहुंचा देती है. शिकायत दर्ज होते ही डेटा भोपाल के सेंट्रल साइबर पुलिस हब को भेजा जाना और बैंक खातों को फ्रीज करने की तेज प्रक्रिया,यह दिखाता है कि सरकार ने केवल पोर्टल ही नहीं बनाया, बल्कि उसके साथ कार्रवाई का समन्वित ढांचा भी खड़ा किया है. यही कारण है कि इस व्यवस्था से लोगों का भरोसा बढऩे की संभावना है. फिर भी, यह समझना होगा कि किसी भी तकनीक का मूल्य उसकी प्रभावशीलता में निहित होता है. शिकायत को तीन दिनों में सत्यापित करके रेगुलर एफआईआर में बदलने की प्रक्रिया पारदर्शी और सरल होनी चाहिए. यदि यहां अनावश्यक औपचारिकताएं बढ़ीं, तो यह पहल भी वही नौकरशाही जकडऩ झेल सकती है, जिससे निजात दिलाने के लिए इसे शुरू किया गया है. साइबर थानों को पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षित मानव बल और आधुनिक तकनीकी साधन उपलब्ध कराना अब सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए. इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि कार्रवाई केवल कागजों में दर्ज न हो, बल्कि परिणाममूलक हो. नागरिकों का अनुभव बताता है कि कई बार एफआईआर के बाद भी जांच की रफ्तार धीमी रहती है. यदि ई-जीरो एफआईआर के बाद भी पीडि़त को महीनों तक इंतजार करना पड़े, तो इस नवाचार का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा. सरकार और पुलिस तंत्र को यह सुनिश्चित करना होगा कि हर शिकायत पर समयबद्ध जांच, निरंतर फॉलो-अप और पीडि़त को अपडेट देने की पारदर्शी प्रणाली विकसित हो. साइबर सुरक्षा केवल तकनीकी व्यवस्था नहीं, बल्कि जागरूकता का विषय भी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘साइबर सुरक्षित भारत’ विजन और बीएनएसएस की नई व्यवस्था तभी सफल होगी, जब समाज के अंतिम पायदान तक डिजिटल साक्षरता पहुंचे. बैंकिंग, यूपीआई, फिशिंग कॉल, निवेश धोखाधड़ी जैसे खतरों के प्रति लोगों को सतर्क करना उतना ही ज़रूरी है, जितना अपराध होने के बाद एफआईआर दर्ज करना. ‘ई-जीरो एफआईआर’ भरोसे का एक मजबूत कदम है,पर यह शुरुआत भर है. अब लक्ष्य होना चाहिए कि साइबर अपराध न केवल दर्ज हों, बल्कि घटें भी. तकनीक, प्रशिक्षण, कानूनी सख्ती और त्वरित कार्रवाई,इन चार स्तंभों पर यदि यह व्यवस्था मजबूती से खड़ी की गई, तो मध्य प्रदेश डिजिटल सुरक्षा के क्षेत्र में एक अनुकरणीय मॉडल बन सकता है.

 

 

 

 

 

 

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