वैश्विक मंच पर भारत की मजबूत पहचान

पिछले कुछ वर्षों में भारत की विदेश नीति केवल औपचारिक राजनयिक संवाद तक सीमित नहीं रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया विदेश यात्राएं इस बदलते दृष्टिकोण की स्पष्ट तस्वीर पेश करती हैं. दिसंबर 2025 में जॉर्डन, इथियोपिया और ओमान की यात्राओं से लेकर उससे पहले नाइजीरिया, गुयाना और भूटान तक—इन सभी दौरों ने यह संकेत दिया है कि भारत अब वैश्विक राजनीति में प्रतिक्रियाशील नहीं, बल्कि नेतृत्वकारी भूमिका निभा रहा है.

सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि ओमान के साथ हुआ व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता है. यह समझौता केवल व्यापारिक आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं का ठोस आधार है. लगभग 98 प्रतिशत भारतीय उत्पादों पर शून्य शुल्क का प्रावधान भारतीय निर्यातकों के लिए नए द्वार खोलेगा. रत्न-आभूषण, कपड़ा, कृषि उत्पाद और एमएसएमई क्षेत्र को इससे सीधा लाभ मिलेगा. ऐसे समय में जब वैश्विक व्यापार संरक्षणवाद की ओर झुक रहा है, ओमान के साथ मुक्त व्यापार समझौता भारत की कूटनीतिक दूरदर्शिता को दर्शाता है.

जॉर्डन की यात्रा ने यह साबित किया कि भारत की विदेश नीति केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि संस्कृति और तकनीक का संतुलित मेल है. नवीकरणीय ऊर्जा और जल प्रबंधन पर हुए समझौते भारत को जलवायु परिवर्तन से निपटने में सहयोगी नेटवर्क प्रदान करते हैं. वहीं पेत्रा और एलोरा के बीच हुआ ‘ट्विनिंग’ समझौता यह दिखाता है कि भारत अपनी सांस्कृतिक विरासत को सॉफ्ट पावर के रूप में वैश्विक स्तर पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर रहा है.

अफ्रीका की बात करें तो इथियोपिया की यात्रा प्रतीकात्मक से कहीं अधिक व्यावहारिक महत्व रखती है. यह प्रधानमंत्री की पहली इथियोपिया यात्रा थी, जिसने भारत-अफ्रीका संबंधों को नई गति दी. भारत खुद को अफ्रीका के लिए केवल निवेशक नहीं, बल्कि विकास भागीदार के रूप में स्थापित कर रहा है—चाहे वह स्वास्थ्य, शिक्षा या डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का क्षेत्र हो.

भूटान यात्रा ने ‘पड़ोसी पहले’ नीति को एक बार फिर ठोस रूप दिया. सीमा पार रेलवे संपर्क का प्रस्ताव केवल परिवहन परियोजना नहीं, बल्कि क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण की दिशा में बड़ा कदम है. इससे पूर्वोत्तर भारत को भी दीर्घकालिक लाभ मिलेगा.

ऊर्जा सुरक्षा के संदर्भ में नाइजीरिया और गुयाना के साथ बढ़ता सहयोग भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है. वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में ऊर्जा आपूर्ति के विविध स्रोत भारत की आर्थिक स्थिरता को मजबूती देंगे.

इन सभी यात्राओं का समग्र संदेश स्पष्ट है—भारत अब केवल एक उभरता हुआ बाजार नहीं, बल्कि वैश्विक समाधान प्रदाता के रूप में आगे बढ़ रहा है. डिजिटल भुगतान प्रणाली (यूपीआई) का विस्तार हो या हरित ऊर्जा में नेतृत्व, भारत अपनी क्षमताओं के साथ वैश्विक जिम्मेदारियां भी निभा रहा है.

कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री मोदी की ये विदेश यात्राएं भारत के 2047 के ‘विकसित भारत’ लक्ष्य की कूटनीतिक नींव मजबूत करती हैं. अब चुनौती यह है कि इन समझौतों का लाभ ज़मीन पर कितना तेज़ और प्रभावी रूप से उतरता है. यदि ऐसा हुआ, तो ओमान जैसे समझौते निश्चय ही भारतीय व्यापारियों और युवाओं की किस्मत बदलने वाले साबित होंगे.

 

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