वन मेले में गोबर घास और जड़ीबूटियों का नया संसार

भोपाल: वन मेला का शुभारंभ लाल परेड मैदान में कर दिया गया। जिसके दूसरे दिन भारी संख्या में लोग मेले में उपलब्ध तमाम जड़ीबूटियों, स्वास्थ्य उपयोगी समानों को खरीदकर जीवन को स्वस्थ रखने और स्वदेशी वस्तुओं की ओर लौटाने का प्रयास कर रहे हैं। मेले में गोबर से लेकर बांस, पचमढ़ी के जंगली प्याज और बावेर घास से नवाचार तक की वस्तुएं न केवल लोगों को लुभा रही हैं बल्कि उन्हें स्वदेशी वस्तुओं से जोड़ रही हैं।

गोबर से गढ़ी स्वदेशी कला की पहचान

16 सालों से गोबर की सहायता से वस्तुओं का निर्माण कर रहा हूं। लगभग 150 प्रकार की प्रदर्शनी में भाग ले चुका हूं। प्रदेश को स्वदेशी वस्तुओं, कलाकृतियों, जनजातीय और पारंपरिक सजावट के सामान सहित, गोबर से बने दिये, पेन स्टैंड, दीवार घड़ी जैसी कई वस्तुएं बनाता हूं। इसमें सबसे छोटे सामान को बनाने में कम से कम 2 से 3 दिन का समय लगता है। यहां मैंने गोवर्धन पर्वत उठाए कृष्ण जी को भी बनाया है, जिसे बनाने में मुझे 180 दिन का समय लगा है। सभी प्रकार की आकृतियों और वस्तुओं को बनाने के बाद इसमें हल्का वार्निश की पॉलिश देते हैं, जिससे ये शीत से बचे रहे और लंबे समय तक चले।

जितेंद्र कुमार राठौर, शिल्पकार

जंगल की जड़ीबूटी से जोड़ों के दर्द में राहत

पचमढ़ी के जंगलों में पाए जाने वाले ये प्याज 5 किलों से लेकर 20 किलो तक के होते हैं। इनसे रस निकालकर इन्हें खास तरीके आंबा हल्दी, दारू हल्दी जैसे कई बूटियों से मिलाकर तैयार करते हैं। शरीर के जोड़ो के दर्द में इस तेल के इस्तेमाल से फायदा मिलता है। ये बढ़ती उम्र के साथ हड्डियों में कम होने वाली चिकनाई को फिर से बनाने का काम करती हैं। जिससे जोड़ों के दर्द में काफी लाभ मिलता है। इसके अलावा हमारे पास विशेष प्रकार का शहद है, जो कि उन मधुमक्खियों द्वारा तैयार किया जाता है, जो सामान्य फूलों के रस की जगह जड़ी बूटियों जैसे शंखपुष्पी भृंगराज तुलसी,अश्वगंधा,गुड़मार का रस लेती हैं। इस कारण यह शहद स्वाद में थोड़ी कड़वी होती है लेकिन स्वास्थ्य के लिए ज्यादा लाभदायक होती है।
मनीष जागुरिया, पचमढ़ी जड़ीबूटी
बावेर घास से बन रही रस्सी और घरेलू उत्पाद
बावेर घास की मदद से रस्सी बनाने का काम करते हैं। इसका उपयोग बांस को बांधने में किया जाता है। ये घास जंगलों में पाई जाती है। सामान्य घास से अलग होती है, इन घासों के कारण कई बार जंगलों तपिश बढ़ने से आग भी लग जाती है। इसीलिए इसको जंगल से काटकर इससे रस्सी बनाने में और घर की वस्तुओं के सामान बनाने में अब इस्तेमाल किया जाने लगा है। जो कि वन की सुरक्षा के लिए भी अच्छा है। साथ ही वन क्षेत्र में रहने वाले लोगों को इससे रोजगार का अवसर भी मिलता है। रस्सी से नये घरेलू उत्पाद बनाकर वन क्षेत्र के लोग आय भी अर्जित कर पाते हैं। वहीं इस घास की सहायता से पूजा की टोकरी, रोटी रखने का डब्बा, चाय की ट्रे, सामान रखने का थैला सहित कुल 18 प्रकार की चीजें यहां उपलब्ध हैं जो पूर्ण रूप से स्वदेशी हैं। हमारे क्षेत्र गाडरवारा में इस घास का सदुपयोग करके भारिया जनजाति के लोग महीने में लगभग 7 से 8 हजार तक की आय बना लेते हैं।
अमन खरे, वन रक्षक, गाडरवारा, नरसिंहपुर

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