भोपाल: कथक कोई नृत्य भर नहीं बल्कि कथा कहने की जीवंत परंपरा है। जब कहानी को पैरों की थाप और भावों के साथ कहा जाता है तो वही कथक बन जाता है। यह कहना है भोपाल की जानी मानी कथक नृत्यांगना और प्राइड ऑफ नेशन अवार्ड से सम्मानित डॉ स्वाति संजय पिल्लै का। कथक मेरे लिए केवल मंच पर किया जाने वाला नृत्य नहीं है। यह मेरे जीवन की भाषा है। कथक को लेकर डॉ स्वाति संजय पिल्लै ने जब नवभारत रिपोर्टर से बात की तो उनकी बातों में बनावटीपन नहीं बल्कि साधना की गहराई दिखी।
3 साल की उम्र से की शुरुवात
डॉ स्वाति ने कथक की शुरुआत महज तीन साल की उम्र में कर दी थी। बचपन में कथक के चक्कर और उसकी लय ने उन्हें इस कदर आकर्षित किया कि नृत्य खेल नहीं बल्कि साधना बन गया। इस यात्रा में उन्हें घर से ही मजबूत आधार मिला। उनके नाना नानी इस विद्या में पारंगत थे। शुरुआती सीख उन्हीं से मिली और यहीं से कथक उनके जीवन की पहचान बनता चला गया।
गिनीज बुक में भी दर्ज हुआ रिकॉर्ड
लगातार अभ्यास और मंचीय प्रस्तुतियों के जरिए उन्होंने एक के बाद एक अपनी पहचान बनाई। देश के कई मंचों पर उनकी प्रस्तुतियों ने सराहना पाई और अनेक रिकॉर्ड भी उनके नाम दर्ज हुए। दो बड़े गिनीज रिकॉर्ड प्रयासों में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। एक दिल्ली में आर्ट ऑफ लिविंग के आयोजन में और दूसरा खजुराहो में जहां 1700 कलाकारों ने एक साथ ताल में नृत्य किया। इस ऐतिहासिक प्रस्तुति में डॉ स्वाति ने नेतृत्व किया।
400 सरकारी शिक्षकों को सिखाया कथक
डॉ स्वाति का मानना है कि कला तभी जीवित रहती है जब वह समाज से जुड़ती है। लोक शिक्षण संचालनालय भोपाल द्वारा मिले एक अवसर ने उनके भीतर नई सोच को जन्म दिया। पहली बार उन्होंने ऑनलाइन माध्यम से 400 सरकारी शिक्षकों को कथक सिखाया। इसके बाद उनके मन में यह भावना जागी कि कथक हर वर्ग तक पहुंचना चाहिए। आज वह सौ से अधिक ऐसे बच्चों को कथक सिखा रही हैं जो आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं।
