भोपाल: रंग संस्कृति नाट्य समारोह के अंतिम दिवस की संध्या पर रंगश्री लिटिल बैले ट्रूप के राग बंध सभागार में पढ़िए कलिमा का मंचन किया गया। यह नाटक उर्दू के मशहूर कथाकार सआदत हसन मंटो की कहानी पर आधारित रहा। नाटक पहले भी कई बार मंचित हो चुका है लेकिन हर प्रस्तुति में इसकी प्रासंगिकता और प्रभाव और गहराता नजर आता है। कहानी की सशक्तता, निर्देशक की सूझबूझ और अभिनेता बालेंद्र सिंह का दमदार अभिनय आर बार नाटक को नया आयाम देता है।
1947 के आजादी काल के दंगों और बंटवारे की पृष्ठभूमि पर आधारित इस नाटक का नाट्य रूपांतरण प्रसिद्ध नाटककार राजेश कुमार द्वारा किया गया है। नाटक मानव की गहरी इच्छाओं और संवेदनाओं को केंद्र में रखता है। इसमें स्त्री और पुरुष के मनोभावों आकांक्षाओं और उनके औचित्य पर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं। नाटक समाज के उस दोहरे मापदंड को सामने लाता है जहां पुरुष की इच्छाओं को सहज स्वीकार्यता मिलती है जबकि स्त्री की आकांक्षाओं पर सवाल खड़े किए जाते हैं।
नाटक यह संदेश देता है कि जीवन की संरचना स्त्री और पुरुष के समान संबंधों से ही संभव है। वर्तमान समय में जब नारी अधिकारों की चर्चा हर स्तर पर हो रही है, तब यह प्रस्तुति समाज को नई सोच और व्यापक दृष्टि से परिचित कराती है। पुरुष सत्ता को चुनौती देता यह नाटक पितृसत्तात्मक समाज में दबी हुई स्त्री आकांक्षाओं के विस्फोट को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है।नाटक में अब्दुल करीम के किरदार में बालेंद्र सिंह का अभिनय बेहद सशक्त और प्रभावी रहा। जिसने न सिर्फ दर्शकों को समाज के विभिन्न पहलुओं पर सोचने को मजबूर किया बल्कि एकल अभिनय से नाटक के सभी पात्रों को जीवित कर दर्शकों का दिल जीत लिया
