भोपाल: शुक्रवार शाम लिटिल बैलेट ट्रूप के रागबंध सभागार में मंचित नाटक एक थी चिड़ी ने साबित कर दिया कि लोककथाओं जैसा मनोरंजन आज भी कहीं नहीं है। आधुनिक कॉमेडी और चमकते परदे की दुनिया से अलग, इस प्रस्तुति ने दर्शकों को उस बचपन की कहानियों में लौटा दिया जहां दादा दादी और नाना नानी की आवाज में लोककथाओं की मिठास बहती थी।
नाटक की शुरुआत होते ही कलाकार दर्शकों के बीच उतर आए और अपने जीवंत अभिनय से माहौल को रंगीन कर दिया। बच्चों के साथ वयस्क भी पात्रों की बातों, चुटकुलों और भावनाओं में खोते चले गए। प्रस्तुति इतनी प्रभावी रही कि कई दर्शकों ने मानो अपने बचपन की कहानी को आंखों के सामने चलते महसूस किया। एक थी चिड़ी ने अपनी सहज प्रस्तुति से यह एहसास कराया कि लोककथाओं की दुनिया आज भी उतनी ही रंगीन, ताज़ा और जीवंत है, जितनी वर्षों पहले दादी नानी की गोद में सुनाई देती थी।
मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय की रंग प्रयोगशाला की इस लोककथा आधारित प्रस्तुति में रंग, संगीत और अभिनय का अद्भुत मेल दिखा। कलाकारों के रंग बिरंगे परिधान, लोक शैली की धुनें और संवादों में स्थानीय भाषा का सम्मिश्रण दर्शकों को बांधे रखा। मंच पर ढोल, तबले और हारमोनियम की संगत ने माहौल को और जीवंत बना दिया। कई गीतों पर दर्शकों के पैर थिरक उठे।
कहानी एक नन्ही चिड़िया के छोटे से दाने को बचाने के संघर्ष से शुरू होती है। बढ़ई से लेकर राजा, रानी, सांप, पानी और हाथी तक सबके दरवाजे खटखटाने के बाद भी उसे मदद नहीं मिलती। अंत में एक छोटी सी चींटी उसका साथ देती है और उसी के साहस से न्याय की राह खुलती है। नाटक यह संदेश देता है कि छोटी से छोटी शक्ति भी बड़े से बड़े अन्याय को चुनौती दे सकती है।
नाटक के हर पात्र के मंच पर आते ही तालियों की गूंज पूरे सभागार में सुनाई देती रही। बच्चों ने जहां कहानी की सरलता का आनंद लिया, वहीं बड़ों ने उसमें छिपी लोक परंपरा और अपनेपन को महसूस किया। नाटक ने यह भी दिखाया कि लोक भाषा और आधुनिक संवादों का मेल युवाओं के लिए भी मनोरंजक और प्रासंगिक हो सकता है।
