सतना: पहले शासकीय मेडिकल कॉलेज और अब भारत रत्न पंडित अटल बिहारी वाजपेयी शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय से संबद्ध जिला चिकित्सालय में आधारभूत व्यवस्थाएं उपलब्ध न होने के कारण एक ओर जहां उसमें अध्ययनरत छात्रों की समस्या कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. वहीं दूसरी ओर चिकित्सा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले कुछ विभाग मेडिकल कॉलेज में अब तक शुरु ही नहीं हो पाए हैं. इतना ही नहीं बल्कि कुछ विभाग ऐसे भी हैं जो शुरु तो हुए, लेकिन कुछ समय बाद ही प्राध्यापकों के चले जाने से अनिश्चतकाल के लिए बंद भी हो गए.
मेडिकल कॉलेज का संचालन सुचारु होने पर एक साथ कई विधाओं का अध्यापन कार्य भी शुरु हो गया था. जिसमें से एक डर्मेटोलॉजी यानी चर्म रोग विभाग भी था. जहां पर सहायक प्राध्यापक विनीत साहू और सीनियर रेजिडेंट डॉ. वाहे गुरु शरण के नेतृत्व में जूनियर चिकित्सकों की टीम मौजूद रहती थी. इसका लाभ जिला चिकित्सालय को भी मिलता था. जहां पर आईसीयू से लेकर विभिन्न वार्ड और ओपीडी में चर्मू रोग चिकित्सक अपनी सेवाएं देने के लिए पहुंचते थे. इतना ही नहीं बल्कि पुराने सिविल सर्जन चेंबर के सामने बनाई गई चर्म रोग की ओपीडी में शहर सहित जिले भर से खासी संख्या में वहां पहुंचने वाले मरीजों को भी लाभ मिलने लगा था.
लेकिन यह मरीजों को मिल रही इस सुविधा पर तब ग्रहण लग गया जब सहायक प्राध्यापक डॉ. साहू ने मेडिकल कालेज सतना से त्यागपत्र दे दिया और भोपाल चले गए. उनके जाने के कुछ दिनों बाद ही सीनियर रेजिडेंट डॉ. वाहे गुरु शरण भी त्यागपत्र देकर यहां से चले गए. हलांकि सहायक प्राध्यापक और सीनियर रेजिडेंट के चले जाने के कुछ समय बाद तक भी जूनियर चिकित्सकों द्वारा ओपीडी का संचालन सुचारू रखने का प्रयास किया गया.
लेकिन किसी अन्य डर्मेटोलॉजिस्ट के यहां पर नहीं आने के कारण जूनियर रेजिडेंटस भी यहां से चले गए. माना जा रहा था कि कुछ समय बाद मेडिकल कॉलेज सतना में दूसरे डर्मेटोलॉजिस्ट आ जाएंगे. लेकिन 9 महीने से अधिक का समय बीत जाने के बावजूद भी किसी डर्मेटोलॉजिस्ट द्वारा यहां पर आकर अपनी सेवाएं देने में रुचि जाहिर नहीं की गई है. नतीजतन एक ओर जहां मेडिकल कॉलेज में अध्ययनरत छात्र इस विभाग से संबंधित आधारभूत प्रायोगिक जानकारियों से अनभिग्य बने हुए हैं. वहीं दूसरी ओर शहर सहित जिले भर के मरीज भी इस महत्वपपूर्ण सुविधा से लगातार मरहूम हैं.
बेहद खर्चीला इलाज
मेडिकल कॉलेज में डर्मेटोलॉजिस्ट और उनकी टीम के उपलब्ध रहने के कारण जिला चिकित्सालय की चर्म रोग ओपीडी में बेहतर इलाज के साथ-साथ कुछ जांच और दवाओं की सुविधा भी उपलब्ध थी. लेकिन उक्त सुविधा के छिन जाने के बाद अब मरीजों को शहर की कुछ निजी क्लीनिकों में जाकर उपचार कराना पड़ रहा है. निजी क्लीनिकों में चर्म रोग का इलाज बेहद खर्चीला होने के कारण यह अधिकांश लोगों की क्षमता से बाहर होता है. हलांकि विकल्प के तौर पर जिला चिकित्सालय के मेडिसिन विभाग में चर्म रोग के इलाज का दावा किया जाता है. लेकिन मेडिसिन ओपीडी में एक ओर जहां अन्य मरीजों की भीड़ का खासा दबाव होता है वहीं दूसरी ओर वहां पर चर्म रोग के मरीजों को सामान्य उपचार ही मिल पाता है.
