भोपाल:हर जीव में एक आत्मा होती है और वही संवेदना चित्रों की रेखाओं में जीवंत होती है. कुछ ऐसी ही चित्रकारी मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय की लिखन्दरा प्रदर्शनी दीर्घा में देखने को मिल रही है. 68 वीं शलाका जनजातीय चित्र प्रदर्शनी कला प्रेमियों को आकर्षित कर रही है. यह प्रदर्शनी तीन दिसंबर से शुरू होकर तीस दिसंबर तक चलने वाली है. गोण्ड जनजातीय समुदाय के युवा कलाकार सुरेन्द्र टेकाम की पेंटिंग्स प्रदर्शित की गई हैं. प्रदर्शनी के दौरान बातचीत में सुरेन्द्र टेकाम से बातचीत के अंश.
प्रकृति से मिलती है प्रेरणा चित्रों को बनाने की प्रेरणा जंगल, पहाड़, पशु, पक्षी और आसपास का प्राकृतिक वातावरण से आती है.
सुरेन्द्र बताते हैं कि वे गोण्ड कला की पारंपरिक शैली यानी डॉट्स लाइन्स और पैटर्न पर काम करते हैं. रंगों में लाल, काला, पीला, हरा और मिट्टी से जुड़े प्राकृतिक रंगों का उपयोग भी करते हैं. इन रंगों से उन्हें बचपन की मिट्टी और जंगल की खुशबू की याद आती है. अपने चित्रों में प्रकृति के जीवन को कहानी की तरह बुनना और उसे एक नई अलग पहचान देने का मेरा प्रयास रहता है.
प्रदर्शनी में लगे उनके चित्रों में पशु पक्षियों के मानवीय रूप जंगल पहाड़ और प्रकृति की सहज सुंदरता प्रमुखता से दिखाई देती है परंपरागत और आधुनिक उपकरणों से तैयार चित्र सुरेन्द्र टेकाम ने बताया कि गोण्ड चित्रकला में परंपरागत और आधुनिक दोनों तरह के उपकरणों का उपयोग किया जाता है. चित्र को बनाने में ब्रश नंबर शून्य से लेकर बारह तक का उपयोग किया जाता है. बारीक रेखाएं और डॉट वर्क के लिए पतले ब्रश, मोटी बॉर्डर और बड़े आकार की भराई के लिए बड़े ब्रश का इस्तेमाल करते हैं. कैनवास बोर्ड और मोटे कागज,पेंसिल और रबड़ प्रारंभिक ड्रॉइंग के लिए उपयोग करते हैं, वहीँ मेरी पेंटिंग्स में फैब्रिक कलर का उपयोग भी देखने को मिलेगा।
सुरेन्द्र टेकाम ने चित्रकला बनाने की प्रक्रिया में बताया कि सबसे पहले विषय का चयन किया जाता है. जो आमतौर पर प्रकृति, पशु, पक्षी, जंगल या लोककथाओं पर आधारित होता है, इसके बाद पेंसिल से हल्की आउटलाइन बनायी जाती है. आउटलाइन के बाद बड़े क्षेत्रों में बेस कलर भरा जाता है. फिर गोण्ड कला की पहचान माने जाने वाले पैटर्न यानी डॉट लाइन और समानांतर आकृतियों को बनाया जाता है.
चित्र पूरा होने पर उसका बॉर्डर भी बनाया जाता है, जिससे कलाकृति को अधिक संतुलन और सौंदर्य मिलता है. इस चित्रकला को बनाने में सबसे अधिक धैर्य की जरूआर होती है. जो ककलकर का सबसे सबसे बड़ा गुण है क्योंकि गोण्ड शैली की बारीक पैटर्निंग में कई घंटो का समय लगता है. आजीविका के लिए गांव में रहकर चित्रकला करने के साथ खेती भी करता हूं. साथ ही बच्चों को भी गोण्ड चित्रकला सिखाता हूं. सुरेंद्र कहते हैं कि उनकी कला में जो भी पहचान है उसका श्रेय परिवार और अपनी परंपराओं को जाता है.
