
भोपाल। रवींद्र भवन के अंजनी सभागार में मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा महाकवि कालिदास के प्रसिद्ध नाटक विक्रमोर्वशीय की भव्य और सुसंस्कृत प्रस्तुति दी गई। राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय ग्वालियर से संबद्ध इस प्रस्तुति ने शास्त्रीय रंग परंपरा और आधुनिक प्रशिक्षण के सुंदर संगम का प्रभावशील उदाहरण प्रस्तुत किया।
इस प्रस्तुति का संगीत और परिकल्पना आमोद भट्ट द्वारा और नृत्य परिकल्पना नम्रता श्रीमाली द्वारा की गई। सहायक निर्देशन का दायित्व द्वारिका दाहिया ने संभाला तथा निर्देशन वरिष्ठ नाट्य निर्देशक रामजी बाली ने किया। मंच सज्जा, संगीत, नृत्य विन्यास और संवादों की ध्वन्यात्मकता ने पूरे नाटक को शास्त्रीय सौंदर्य से भर दिया। विक्रमोर्वशीय की यह प्रस्तुति ने गुरुवार शाम दर्शक दीर्घा में बैठे हर व्यक्ति को अभिनय के नए आयामों के साथ बेहतरीन प्रस्तुति का आनंद दिया।
कथा का मंचन
नाटक की कथा पुराणों, वेदों और प्राचीन काव्य में वर्णित पुरुरवा और उर्वशी के अद्भुत प्रेम पर आधारित रही। मंचन की शुरुआत उस प्रसंग से की गई जिसमें राजा पुरुरवा अप्सराओं को असुर केशी से मुक्त कराते हैं और इसी क्षण उर्वशी के मन में उनके प्रति आकर्षण जन्म लेता है। निर्देशक ने इस दृश्य को भव्य प्रकाश संयोजन और संगीत के सहारे अत्यंत प्रभावी बनाया और दर्शकों की तालियां बटोरी। इस प्रस्तुति के बाद नाटक में इंद्रसभा का दृश्य सामने आता है जहां भरत द्वारा रचित नाटक का प्रदर्शन हो रहा है। उर्वशी का मन पुरुरवा में रमा होने के कारण वह अभिनय भूल जाती है और भरत के शाप का सामना करती है। मंचन में इस भाव परिवर्तन को अभिनय और नृत्य के संयोजन से बहुत ही सहज रूप में दिखाया गया। नाटक का मध्य भाग उर्वशी के पृथ्वी पर आने, पुरुरवा और उसके प्रेम, गंधमादन पर्वत पर बिताए समय और श्रापवश लता बनने की घटना पर केंद्रित रहा। पुरुरवा का व्याकुल भटकना और उर्वशी की तलाश को सटीक दृश्यों और भावपूर्ण अभिनय से प्रस्तुत किया गया।
