
छतरपुर। जिले के बिजावर तहसील में घने जंगलों और जेसी फ्रीऊँची-नीची पहाड़ियों के बीच स्थित प्रा उपचीन जटाशंकर धाम की कहानी जितनी पावन है, उतनी ही रोमांचक भी। भोलेनाथ का यह ऐतिहासिक मंदिर शांत वातावरण और प्राकृतिक सौंदर्य से मन को सुकून देता है, लेकिन इसके पीछे छिपे रहस्य आज भी लोगों को चौंकाते हैं।
त्रिमूर्ति डकैतों का ठिकाना था जटाशंकर
कभी इस क्षेत्र में खूंखार त्रिमूर्ति डकैतों — मूरत सिंह, रामसिंह और पूजा बाबा — का खौफ फैला रहता था। इनका आतंक छतरपुर के अलावा पन्ना, दमोह और सागर तक फैल चुका था। लोगों में डर इतना था कि शाम ढलते ही गांवों में सन्नाटा पसर जाता था।
डकैतों ने कराया मंदिर का विकास
जटाशंकर मंदिर का विस्तार किसी साधु, संत या प्रशासन ने नहीं करवाया था, बल्कि इसी त्रिमूर्ति गैंग ने करवाया। मंदिर की सीढ़ियाँ, धर्मशाला और आसपास बने अन्य निर्माण आज भी उनके अस्तित्व की कहानी कहते हैं। डकैत अक्सर इस घने जंगल वाले क्षेत्र में शरण लेते थे और समय के साथ उन्होंने मंदिर को विकसित करना शुरू किया।
लूट के पैसों से हवन, यज्ञ, भंडारे
इन डकैतों का दावा था कि वे भोलेनाथ के भक्त हैं। अपहरण और लूट से जो धन जुटता था, उसका बड़ा हिस्सा वे मंदिर में हवन, यज्ञ और भंडारे कराने में खर्च करते थे। किसी भी बड़े ‘काम’ से पहले वे यहां पूजा करने आते थे।
60 साल पुराने गवाह बताते हैं कहानी
जटाशंकर धाम के पास 60 साल से दुकान चला रहे जयशंकर अग्रवाल बताते हैं कि पहले यहां घना जंगल और ऊँची पहाड़ियाँ थीं, जहां लोग जाने से डरते थे। डर का बड़ा कारण था—तीनों डकैतों का यहां छिपना। वे बताते हैं कि डकैत मंदिर निर्माण को अपना धार्मिक कर्तव्य मानते थे और लूट का धन भी इसी में लगा देते थे।
जटाशंकर धाम आज आस्था और शांति का प्रतीक है, लेकिन इसका रहस्यमयी अतीत यह बताता है कि भक्ति और भय, दोनों कभी-कभी एक ही स्थान पर सह-अस्तित्व रख सकते हैं।
