पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के जरिए की जा रहीं सिफारिशें.

महाकौशल की डायरी

अविनाश दीक्षित

संगठन में शामिल होने का संघर्ष और अपने-अपने चहेतों के नामों को कार्यकारिणी में महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित कराने की जंग फिलहाल भारतीय जनता पार्टी के खेमे में देखी जा रही है। राजनैतिक गलियारों के सूत्रों की माने तो सिफारिशों का दौर अब नए प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के पास सीधे नहीं बल्कि पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के जरिए पहुंचाया जा रहा है। जिससे कहीं न कहीं गोटी सटीक फिट बैठ जाए। फिलहाल तो किसी के नाम पर सहमति बनाना और किसी नाम को हटवाने की कवायद के कारण ही भाजपा की नई कार्यकारिणी घोषित नहीं हो पा रही है।

राजनैतिक विश्लेषकों की माने तो भाजपा की नई कार्यकारिणी के नाम के ऐलान में कुछ नामों में सहमति तो बन गई है लेकिन कुछ पदों के नाम को लेकर विरोध के स्वर बुलंद होते जा रहे हैं जिसका मूल कारण व्यक्तिगत, सामाजिक, जातिगत, क्षेत्रवाद गिनाया जा रहा है। उधर शहर में संगठन के भीतर ऐसे बहुत से पदाधिकारी व नेता अभी भी नई कार्यकारिणी में नाम शामिल किए जाने की चाह लेकर दृष्टि टिकाए बैठे हैं जिनका 9 वर्ष से अधिक का कार्यकाल भी पूरा हो चुका है। चर्चाएं तो ये भी हैं कि पूर्व भाजपा अध्यक्ष प्रभात साहू भी इसी तरह की खींचातानी के चक्कर में अपनी कार्यकारिणी घोषित नहीं कर पाए थे। ऐसे में कयास ये भी लगाए जाने लगे हैं कि कहीं चहेतों को उपकृत कराने के चक्कर में भाजपा की नई कार्यकारिणी का ऐलान दूर की कौड़ी ना बन जाए।

फर्जी हाजिरी के भुगतान के खुलासे ने उड़ाई नींद….

रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय एक बार फिर से सुर्खियों में आया.. इस बार वजह जो सामने आई वो काफी चौंकाने वाली रही है। विवि में गेस्ट फैकल्टी की मौजूदगी और भुगतान को लेकर एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। ऑडिट विभाग ने जांच की तो इसका खुलासा हुआ जिसमें पता चला कि कई विजिटिंग फैकल्टी एक ही समय में अलग-अलग जगह उपस्थित दिखाई दिए। हैरानी की बात यह थी कि जिन शिक्षकों ने एक स्थान पर परीक्षा ली, उन्हें उसी समय दूसरी जगह की उपस्थिति भी दर्ज कर दी गई। इस दोहरी मौजूदगी के आधार पर उनका महीनों तक भुगतान भी जारी रहा। हालांकि खुलासा होने के बाद भुगतान पर तत्काल रोक लगा दी गई और विश्वविद्यालय प्रशासन से जवाब तलब किया गया। इधर विवि के ऐसे अधिकारी-कर्मचारियों की नींद उड़ाकर रख दी है जो कि इस बड़े फर्जीवाड़े में शामिल हैं।

इसमें कौन कौन शामिल है इसका तो पता आने वाले दिनों में पता चल जाएगा। लेकिन फर्जीवाड़े की इस हद से विवि प्रशासन को एक बार फिर से कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। इतने बड़े मुद्दे को लेकर अभी तक विश्वविद्यालय के कुलगुरू डॉ. राजेश वर्मा के द्वारा अभी तक कोई बयान नहीं देना तमाम सवाल खड़े कर रहा है। चर्चाएं हैं कि आरडीवीवी के अंदर ही कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत से ये खेल खेला गया है। उधर ऑडिट करने वाली टीम ये पता लगाने में जुटी है कि विवि में आखिर ये फर्जीवाड़ा कितने समय से चल रहा था और इस तरह कितने की क्षति विवि प्रशासन को जालसाजों ने पहुंचाई है। खबर है कि ऑडिट विभाग की टीम अब विवि के जिम्मेदार अधिकारियों को भी शिकंजे में कसने वाली है जिसके तहत विवि के सभी विभागों की उपस्थिति व भुगतान रजिस्टर की दोबारा जांचने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

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