निमाड़ी बोली को राजकीय भाषा बनाने का संघर्ष जारी : जगदीश जोशीला

इंदौर:पद्मश्री जगदीश जोशीला ने कहा कि निमाड़ी बोली को राजकीय भाषा के रूप में स्थापित करने का संघर्ष अभी जारी है. इस कार्य के लिए हमने निमाड़ी बोली का शब्दकोश तैयार किया है. इसके साथ ही साहित्य भी तैयार किया, लेकिन अभी तक इसे राजकीय भाषा का दर्जा नहीं दिलवा पाए हैं.पद्मश्री जोशीला अभ्यास मंडल की 65वीं वार्षिक व्याख्यानमाला में लोकभाषा संरक्षण की अनूठी पहल विषय पर अपना संबोधन दे रहे थे. कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथि का स्वागत शरद सोमपुरकर, मुकेश तिवारी और मनीषा गौर ने किया. संचालन कुणाल भंवर ने किया. अभ्यास मंडल का परिचय हरेराम वाजपेयी ने दिया. आभार प्रदर्शन स्टेट प्रेस क्लब के अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल ने किया. अतिथि को स्मृति चिह्न शंकरलाल गर्ग और अनिल कर्मा ने भेंट किया.

जगदीश जोशीला ने निमाड़ी बोली को भाषा बनाने के लिए अब तक किस तरह से क्या संघर्ष किया गया, उसका पूरा वृत्तांत विस्तार के साथ सुनाया. उन्होंने कहा कि वर्ष 1319 से लेकर 1644 तक का समय भक्तिकाल का समय था. इस 325 वर्ष के समय में जनपदीय व्यवस्था थी. इस व्यवस्था में भक्त कवि हुए. हर कवि ने अपनी बोली में लेखन के कार्य को अंजाम दिया. तुलसीदासजी ने रामायण लिखी तो सूरदास जी ने ब्रज की भाषा में लिखा.

मीराबाई ने राजस्थानी में लिखा, नरसी मेहता ने गुजराती में लिखा, तुकाराम ने मराठी में लिखा तो गुरु नानक ने पंजाबी में लिखा. सभी ने अपनी-अपनी बोली में लिखकर उस बोली को ज्यादा आकार दिया. निमाड़ के संत सिगाजी ने अद्वैत पर निर्गुण धारा का सृजन किया. इसे 508 साल हो गए हैं. देश की आजादी के बाद भक्त कवि के द्वारा लिखे गए साहित्य के आधार पर बोलियों को राजभाषा का दर्जा दिया गया. इसमें निमाड़ी भाषा के साथ सौतेला व्यवहार हुआ.

निमाड़ी बोली का 30 हजार शब्दों का शब्दकोष तैयार किया
उन्होंने कहा कि 19 सितंबर, 1953 को हमने निमाड़ लोक साहित्य परिषद का गठन किया. इस परिषद में माखनलाल चतुर्वेदी, पद्मश्री रामनारायण उपाध्याय, विश्वनाथ, जड़ावचंद्र जैन जैसे लोग जुड़े. हमने 20 साल तक संघर्ष किया, लेकिन सफलता नहीं मिली. इस घटनाक्रम से यह संस्था सिमट गई. हमारी निमाड़ी बोली उपेक्षा का शिकार रही. उज्जैन के टेपा सम्मेलन की तर्ज पर हमने निमाड़ में ठापा सम्मेलन शुरू किया. इसके बाद निमाड़ी भाषा का शब्दकोश और व्याकरण तैयार करने के लिए एक कमेटी बनाई, जिसने 30 हजार शब्द चयनित किए . इसके बाद हमने भारत सरकार को यह पूरा शब्दकोश प्रकाशित कर भेंट किया और चाहा कि सरकार द्वारा निमाड़ी बोली को राजकीय भाषा का दर्जा दिया जाए, तो फिर वहां से जवाब आया कि यह काम राज्य सरकार को करना है.

जोशीला ने कहा कि फिर हमने राज्य सरकार को भी सारे दस्तावेज सौंप दिए. पिछले 25 साल से जवाब का इंतजार कर रहे हैं. मध्यप्रदेश में हर बोली के क्षेत्र में विश्वविद्यालय स्थापित हो गए और उन बोलियों को संरक्षण मिला. निमाड़ क्षेत्र में अभी तक कोई विश्वविद्यालय नहीं था. अब पहला विश्वविद्यालय आया है तो वह भी टंटिया भील के नाम पर आया है. बोलने वालों की कमी से भाषा लुप्त हो जाती है. निमाड़ी बोली के साथ ऐसा न हो, इसके लिए हमारे द्वारा जनजागरण अभियान चलाया जा रहा है. निमाड़ क्षेत्र से आदि शंकराचार्य, संत सिंगाजी, लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर, टंटिया भील, राणा बख्तावर सिंह पर फोकस कर साहित्य तैयार किया गया है

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