धर्मेंद्र का जाना एक युग का अंत

भारतीय सिनेमा की लंबी परंपरा में अनेक सितारे आए, चमके और इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए. लेकिन कुछ नाम ऐसे होते हैं, जिनकी चमक सिर्फ पर्दे तक सीमित नहीं रहती, वह करोड़ों दिलों में उतर जाती है. धर्मेंद्र उन्हीं दुर्लभ कलाकारों में से एक थे. उनका जाना केवल एक अभिनेता का खोना नहीं है, बल्कि उस मासूम, सादगी-भरे, दमदार हिंदी सिनेमा की विदाई है, जिसे उन्होंने अपने पूरे मन से जिया.पंजाब के एक छोटे से गाँव से मुंबई तक की दूरी केवल किलोमीटरों में नहीं मापी जा सकती. धर्मेंद्र ने इसे अपने सपनों, संघर्षों और अथक मेहनत से तय किया. 1960 के दशक में जब उन्हें पहला मौका मिला, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह युवा आगे चलकर भारतीय सिनेमा का चेहरा बनेगा. 65 साल के करियर और 300 से अधिक फिल्मों में उनका दिखाया गया अभिनय बताता है कि सिनेमा उनके लिए महज़ काम नहीं था — वह उनका जुनून था. धर्मेंद्र की सबसे बड़ी खूबी थी उनकी बहुमुखी प्रतिभा. वह किसी एक सांचे में नहीं ढलते थे, बल्कि हर किरदार में अपनी अलग छाप छोड़ते थे. ‘अनपढ़’, ‘शराफत’ और ‘फूल और पत्थर’ जैसी फिल्मों में उनका रूमानी अंदाज़ सहज, सादगी से भरा और दिल को छू लेने वाला था. वह अपने दौर के सबसे ईमानदार रोमांटिक नायकों में गिने जाते थे.

धर्मेंद्र जब स्क्रीन पर एक्शन करते थे, तो वह महज कोरियोग्राफी नहीं होती थी. उसमें रफ्तार, ताकत और ऊर्जा का संगम होता था. ‘चरस’, ‘जुगनू’, ‘लोहा’ इन सभी फिल्मों ने उन्हें भारतीय सिनेमा का असली एक्शन स्टार बना दिया. ‘चुपके चुपके’ में प्रोफेसर परिमल त्रिपाठी के रूप में उनकी कॉमिक टाइमिंग आज भी बेजोड़ मानी जाती है. वह बिना किसी शोर-शराबे, बिना अतिशयोक्ति के दर्शकों को हंसा देते थे, यह गुण बहुत कम कलाकारों में मिलता है. बसंती, इन कुत्तों के सामने मत नाचना.’ यह संवाद सिर्फ सिनेमाई इतिहास नहीं, भारतीय संस्कृति का हिस्सा बन चुका है. ‘वीरू’ का उनका किरदार उनकी लोकप्रियता की पराकाष्ठा था. 1997 में फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड और 2012 में पद्म भूषण प्राप्त करना इस बात का प्रमाण है कि उनका योगदान केवल लोकप्रियता तक सीमित नहीं था, बल्कि भारतीय कला परंपरा में भी उनका विशेष स्थान था. धर्मेंद्र वह कलाकार थे जिनकी फिल्मों पर परिवार साथ बैठकर हंसता था, रोमांस महसूस करता था, और एक्शन पर तालियाँ बजाता था. उनकी स्क्रीन-प्रेज़ेंस में बनावटीपन नहीं था. वह गाँव का लडक़ा भी लगते थे, शहरी प्रेमी भी; मज़बूत हीरो भी और संवेदनशील इंसान भी. शायद यही वजह थी कि वह केवल स्टार नहीं बने, जनप्रिय नायक बने.धर्मेंद्र चले गए, पर उनकी मुस्कान, उनकी आवाज़, उनका सहज अभिनय और उनका मानवीय आकर्षण हमेशा जीवित रहेगा. उनकी फिल्में इस देश की सांस्कृतिक विरासत हैं और रहेंगी. आज जब हम इस महान कलाकार को अलविदा कहते हैं, तो यह भी स्वीकार करना होगा कि उन्होंने हमें छ: दशकों तक मनोरंजन, प्रेरणा और आनंद दिया. उनका जाना दुखद है, लेकिन उनकी विरासत अमर है. दरअसल,माया नगरी की चकाचौंध में भी धर्मेंद्र एक ऐसी शख्सियत थे, जो हमेशा इस देश की मिट्टी से, खास तौर पर पंजाबी तासीर से जुड़े रहे. इतने बड़े स्टार होने के बावजूद वो बेहद सरल और सहज व्यक्तित्व के मालिक थे. उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि !

 

 

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