भारत ने विकसित देशों को जलवायु फंडिंग बढ़ाने की याद दिलाई

बेलेम (ब्राजील), 23 नवंबर (वार्ता) भारत ने जलवायु फंडिंग बढ़ाने की दिशा में अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि विकसित देशों से वित्तीय संसाधनों के बिना विकासशील देश राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान(एनडीसी) के कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्य को पूरा नहीं कर सकते।
उल्लेखनीय है कि एनडीसी पेरिस समझौते के तहत राष्ट्रीय जलवायु योजनाएं हैं, जो उत्सर्जन में कटौती करने और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होने के लक्ष्य निर्धारित करती हैं। पेरिस समझौते के तहत सभी देश मिलकर उत्सर्जन कम करने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए एक साथ काम करने पर सहमत हुए।
भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने जलवायु फंडिंंग पर अनुच्छेद 9.1 को आगे बढ़ाने के लिए किए गए प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि तीन दशक पहले रियो में किए गए वादों को अब पूरा किया जाना चाहिए। भारत ने न्यायोचित परिवर्तन तंत्र”जस्ट ट्रांजिशन मैकेनिज्म” की स्थापना को कॉप-30 का महत्वपूर्ण परिणाम बताया। उसने उम्मीद जताई कि यह वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर समानता व जलवायु न्याय को लागू करने में मदद करेगा।
‘न्यायोचित परिवर्तन तंत्र’ का उद्देश्य जीवाश्म ईंधन (जैसे कोयला) पर आधारित अर्थव्यवस्था से एक स्वच्छ, हरित अर्थव्यवस्था में बदलाव इस तरह से लाना है कि यह सभी के लिए निष्पक्ष, समावेशी और टिकाऊ हो। इसका मतलब है कि किसी भी व्यक्ति या समुदाय को पीछे नहीं छोड़ा जाए, विशेषकर उन समुदायों को जो कोयला खदानों जैसे कार्बन-गहन उद्योगों पर निर्भर हैं।
भारत ने एकतरफा व्यापार-प्रतिबंधात्मक जलवायु उपायों पर चर्चा का अवसर देने के लिए भी धन्यवाद दिया। भारत ने कहा कि ऐसे उपाय विकासशील देशों को नुकसान पहुंचाते हैं। भारतीय ने कहा कि कमजोर और सबसे कम जिम्मेदार देशों पर उत्सर्जन घटाने का बोझ नहीं डाला जाना चाहिए।

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