
नई दिल्ली, 14 नवंबर 2025: बिहार विधानसभा चुनाव में कभी देश के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक रणनीतिकारों में शुमार प्रशांत किशोर द्वारा शुरू की गई जन सुराज पार्टी का प्रदर्शन उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहा। शुरुआती रुझान बताते हैं कि पार्टी अपना खाता भी खोलती नहीं दिख रही है, जिससे वैकल्पिक राजनीति की शुरुआत का दावा ठंडा पड़ गया है। तीन साल से अधिक समय तक लगातार जनसंपर्क और 3,500 किलोमीटर से अधिक की पदयात्रा के बावजूद, पार्टी मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने में असफल रही।
जातीय समीकरणों की चुनौती और संगठन की कमजोरी
जन सुराज के जादू न चलने का मुख्य कारण बिहार की जातिगत संरचना से जुड़ी राजनीति और संगठन की कमजोर नींव रही। पार्टी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दों पर केंद्रित थी, लेकिन जातीय गोलबंदी के सामने यह विचार कमजोर पड़ गया। मुस्लिम वोटर और कई अन्य जातियाँ भाजपा को रोकने के लिए महागठबंधन को अधिक सुरक्षित विकल्प मानकर उसके साथ रहीं। इसके अलावा, जमीनी संगठन का कमजोर होना, आंतरिक मतभेद और पैराशूट उम्मीदवारों को प्राथमिकता देना भी असंतोष का कारण बना।
प्रशांत किशोर के स्वयं चुनाव न लड़ने का असर
जन सुराज का सबसे बड़ा चेहरा होने के बावजूद प्रशांत किशोर ने स्वयं चुनाव नहीं लड़ा, जिससे मतदाताओं में यह प्रश्न बना रहा कि क्या वे पूरी तरह राजनीति में उतरने को लेकर आश्वस्त हैं। पारंपरिक राजनीति में नेता का मैदान में उतरना विश्वसनीयता का प्रतीक माना जाता है, जो यहाँ अनुपस्थित था। इसके अलावा, ग्रामीण इलाकों में सीमित पहचान और उम्मीदवारों पर दबाव के कारण नामांकन वापस होना भी पार्टी के मोमेंटम को तोड़ने वाले प्रमुख कारणों में शामिल रहे।
