स्वदेशी मेले में परंपरा और हुनर का संगम, स्वदेशी उत्पादों से कारीगर भर रहे मेले में जान

भोपाल: स्वर्णिम भारत फाउंडेशन द्वारा आयोजित स्वदेशी मेला संस्कृति और परंपरा के रंगों से सराबोर है। स्वदेशी मेले में देश के विभिन्न राज्यों से पारंपरिक और हस्तनिर्मित वस्तुओं के स्टॉल आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। कश्मीर की हस्तनिर्मित कुर्तियां, सहारनपुर की लकड़ी की सजावटी वस्तुएं, गुजरात का प्रसिद्ध कढ़ावर्क और बंगाल के खजूर के पत्तों से बने आर्टिफिशियल फूल मेले की शोभा बढ़ा रहे हैं।

ये सभी वस्तुएं न केवल स्वदेशी कारीगरी का उत्कृष्ट उदाहरण हैं बल्कि आम जनता के लिए किफायती दरों पर उपलब्ध भी हैं। मेले में आयोजित थाली सजाओ प्रतियोगिता ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। शाम चार बजे शुरू हुई इस प्रतियोगिता का आयोजन अत्यंत उत्साह और पारंपरिक रंग-रूप के साथ संपन्न हुआ। प्रतियोगिता की प्रभारी मनीषा चौरसिया, सह प्रभारी ज्योति नामदेव व मालती साहू ने आयोजन को व्यवस्थित तरीके से संयोजित किया।

मेले में शाम को कई सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी दी गईं। जिसमें विभिन्न भाषाओं के नृत्य देखन को मिले। आयोजन महिला सशक्तिकरण को ध्यान में रखते हुए सम्पूर्ण कार्यभार महिलाओं द्वारा ही संयोजित किया गया। गांधी आश्रम के विकलांग बच्चों द्वारा भी सांस्कृतिक प्रस्तुति ने लोगों की खूब तालियां बटोरी। कार्यक्रम में राजस्थानी, नेमारी, कत्थक जैसे कई विषयों पर भारतीय संस्कृति को दर्शाता हुआ मेरा भारत, देश रंगीला, साथी हाथ बटाना जैसे संगीतों पर भी नृत्य की एकल और समूह प्रस्तुति दी गई। यह स्वदेशी मेला 16 नवंबर तक जारी रहेगा। जो शहरवासियों के लिए स्वदेशी उत्पादों की सुंदरता और भारतीय संस्कृति के अनुभव का अनोखा अवसर प्रदान कर रहा है।
मिट्टी की ज्वेलरी और माड़ना ट्रेडिशनल आर्ट से बढ़ रही मेले की रौनक
यह मध्यप्रदेश की प्रसिद्ध माड़ना ट्रेडिशनल आर्ट है। इसे बहुत ही बारीकी से तैयार किया जाता है। साथ ही है हमारे पास ये मिट्टी से बनी ज्वेलरी है, जिसे लोग खूब पसंद कर रहे हैं। इस ज्वेलरी को बनाने में 2 से 3 दिन का समय लगता है। इसमें हम मिट्टी के अलग अलग डिजाइन बनाकर उसको एक दुसरे से जोड़कर पूरा हिस्सा तैयार करते हैं। फिर रंग से इसे सजाया जाता है। कुछ डिजाइन के सांचे भी है उनसे आसानी होती है लेकिन नए नए डिजाइन देने में समय और मेहनत ज्यादा लगती है इसलिए इनकी कीमत थोड़ी ज्यादा होती है।
प्रेरणा शर्मा, भोपाल
बिट्स वर्क की थाली और काघावर्क जर्जेटिक फ्रेम पर तिल थी निगाहें

हमारे पास गुजरात के प्रसिद्ध होम डेकोर के प्रसिद्ध बिट्स वर्क हैं। ये थाली जैसे दिखते हैं। इनका उपयोग डायनिंग टेबल पर सेंटर में और प्लेट रखने वाली जगहों पर किया जाता है। पुराने समय में राजा महाराजाओं के यहां ऐसे बिट्स वर्क की थालियों का उपयोग होता था। साथ ही गुजराती काघावर्क जर्जेटिक उपलब्ध है। इनको फ्रेम करवाकर दीवारों पर सजावट के लिए लगाया जाता है। जो अलग ही पहचान और शान बनाती है।
पिंटू राजपूत, गुजरात
असली दिख रहे आर्टिफिशियल फूल
ये आर्टिफिशियल फूल है देखने में बिल्कुल असली लगते हैं। इनको बांस की लकड़ी, खजूर के पत्तों और तनों को छिलकर छोटे छोटे रूप में आकर देते हैं। फिर इनको कलर करके गुलदस्ता और एकला फूलों के रूप में बाजार में विक्रय के लिए लाते हैं। इनकीबनवत बारीकी से होती है। रंगों का उपयोग गाढ़ा होता है जिससे ये फूल देखने में बिल्कुल असली लगते हैं। इनको कीमत केवल 30 रुपए से शुरू है। यह पूरी तरहबसे हाथों से बनाए जाते हैं।
सुनील पांडे, बंगाल

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