
नई दिल्ली, 31 अक्टूबर 2025 : बिहार की चुनावी राजनीति में 18% आबादी वाले मुस्लिम समुदाय का वोट सत्ता की चाबी माना जाता है, लेकिन हाल के चुनावी नतीजे चौंकाने वाले हैं। आंकड़ों के अनुसार, मुस्लिम-प्रभावित क्षेत्रों में भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का पलड़ा भारी रहा है। राज्य में कुल 86 सीटें ऐसी हैं, जहाँ मुस्लिम आबादी निर्णायक मानी जाती है। पिछले चुनाव में, कांटे की टक्कर के बावजूद, एनडीए ने इन 86 सीटों में से 57 पर जीत दर्ज की थी। विशेष रूप से 20% से अधिक मुस्लिम आबादी वाली 51 सीटों पर तो राजग (NDA) का स्ट्राइक रेट 71% रहा।
मुस्लिम बहुल सीटों पर एनडीए की इस सफलता का प्रमुख कारण समानांतर ध्रुवीकरण और मुस्लिम मतों का बिखराव रहा है। विपक्षी महागठबंधन के पक्ष में मुस्लिम मतों के एकतरफा ध्रुवीकरण की आशंका के बावजूद, अल्पसंख्यक वोटों का एक समानांतर ध्रुवीकरण होता रहा है, जिसका सीधा लाभ सत्ताधारी एनडीए को मिला। सीमांचल (किशनगंज, कटिहार) और पश्चिम चंपारण-मुंगेर जैसे क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी 22% से 68% तक है, जो नतीजों को प्रभावित करती है।
इन सीटों पर भाजपा तब और भी अधिक मजबूत हो जाती है, जब उसे नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड (JDU) का साथ मिलता है। 2015 में जब नीतीश ने भाजपा का साथ छोड़ दिया था, तब विपक्षी महागठबंधन को इन 86 सीटों में से अधिकांश (58 सीटें) पर जीत मिली थी, जबकि भाजपा केवल 22 सीटें ही जीत सकी थी। अब बिहार की राजनीति में असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM और जनसुराज पार्टी भी इस समुदाय पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। एआइएमआइएम ने मुस्लिम-प्रभावित लगभग सभी सीटों पर इसी समुदाय के उम्मीदवार उतारने की रणनीति अपनाई है, जिससे वोटों का और बिखराव हो सकता है।
