देवास। जिले की बागली विधानसभा क्षेत्र से इस वर्ष भी रोज़गार की तलाश में बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हो गया है। बीते तीन दिनों में छह से अधिक बसें महाराष्ट्र के पुणे शहर के लिए रवाना हुईं, जिनमें करीब एक हजार से ज़्यादा महिला, पुरुष और बच्चे सवार थे। ये सभी परिवार वहां ईंट भट्टों पर काम करने जा रहे हैं और लगभग छह माह बाद लौटने की उम्मीद है।
जानकारी के अनुसार, ठेकेदारों द्वारा ग्रामीणों से पहले ही अनुबंध के तहत अग्रिम राशि (एडवांस) दी जाती है। कार्यस्थल पर रहने और खाने की व्यवस्था भी ठेकेदारों की ओर से की जाती है।
बागली विकासखंड की 118 पंचायतों में लगभग 60 से अधिक आदिवासी बहुल ग्राम पंचायतें हैं, जहां खेती के अलावा कोई स्थायी रोजगार का साधन नहीं है। बारिश पर निर्भर खेती, सीमित भूमि और मनरेगा में देरी से भुगतान ने ग्रामीणों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि मनरेगा में मजदूरी कम मिलने और समय पर भुगतान न होने से वे मजबूर होकर दूसरे राज्यों में पलायन करते हैं। गांवों में रोजगार न होने के कारण महिलाएं और बच्चे भी मजदूरी के लिए साथ जा रहे हैं।
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार की गरीबी उन्मूलन, मनरेगा, मुफ्त अनाज और शिक्षा योजनाओं पर हर साल करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन इन योजनाओं का जमीनी असर नगण्य है। हालात यह हैं कि प्रशासन के पास पलायन करने वाले परिवारों की कोई आधिकारिक जानकारी या आंकड़ा तक नहीं है।
बागली क्षेत्र में बढ़ता पलायन विकास की दिशा पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। ग्रामीण अब भी बुनियादी सुविधाओं और स्थायी रोजगार से वंचित हैं।
