विश्वविद्यालय में अतिथि विद्वानों की नियुक्ति को लेकर उठे सवाल, नियमों को किया दरकिनार

रीवा:अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय में अतिथि विद्वानों की नियुक्ति में नियमो की धज्जियां उड़ाई गई और मनमानी तरीके से नियुक्ति की गई है. अधिवक्ता अभिषेक तिवारी ने कुलगुरू और विश्वविद्यालय प्रशासन पर सवाल उठाया है. साथ ही पूरे मामले की जांच कराए जाने की मांग की है.पत्रकारवार्ता में आरोप लगाया गया कि विश्वविद्यालय में अयोग्य अतिथि विद्वानों की नियुक्ति अवैध तरीके से की गई है. कुलगुरू, कुलसचिव और विभागाध्यक्षो की मिली भगत से 20 नियुक्ति की गई है. सत्र 2025-26 के लिए विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों में करीब 20 अतिथि विद्वानों की नियुक्तियाँ पूर्णत: नियमविरुद्ध तरीके से की गईं, जिनमें न न्यूनतम योग्यता का पालन हुआ, न प्रक्रिया का. विश्वविद्यालय प्रशासन ने यह नियुक्तियाँ वॉक-इन इंटरव्यू प्रक्रिया और कार्यपरिषद द्वारा अनुमोदित नियमावली को दरकिनार करते हुए मात्र नोटशीट पर अनुमोदित कर दीं.

2016 तक एपीएस विश्वविद्यालय में अतिथि विद्वानों की नियुक्ति नोटशीट अनुमोदन प्रणाली से होती थी. लेकिन उस पर गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगे, जिसके बाद तत्कालीन विश्वविद्यालय प्रशासन ने एक प्राध्यापक समिति गठित कर अतिथि विद्वानों के लिए नई नियमावली तैयार की. इस नियमावली को विद्या परिषद एवं कार्यपरिषद दोनों ने अनुमोदित किया और सत्र 2016-17 से यह प्रभावी हुई. इस नियमावली के अनुसार 50′ अंक शैक्षणिक उपलब्धियों (दसवीं, बारहवीं, स्नातक, स्नातकोत्तर, नेट/सेट/पीएचडी एवं शोध प्रकाशन) पर आधारित होंगे. 50′ अंक वॉक-इन इंटरव्यू में दिए जाएंगे. इंटरव्यू समिति में संबंधित विषय के डीन, विभागाध्यक्ष, बाह्य विशेषज्ञ एवं एससी/एसटी वर्ग के प्राध्यापक अनिवार्य होंगे यह प्रक्रिया विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद की स्वीकृति से बनी और आज भी प्रभावशील है. सवाल यह उठता है कि कुलगुरू को कार्य परिषद द्वारा अनुमोदित नियमावली रद्द करने या अनदेखी करने का अधिकार है या नही. जिस तरह मनमानी तरीके से अतिथि विद्वानों को रखा है कि उसकी ईओडब्ल्यू से जांच कराई जाय.
2025-26 में उड़ी नियमों की धज्जियाँ
सत्र 2025-26 में विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस नियमावली को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया. कुलगुरु और प्रशासन ने न तो किसी प्रकार का विज्ञापन जारी किया, न ही इंटरव्यू आयोजित किया. बल्कि, विभागाध्यक्षों से सिफारिश लेकर केवल नोटशीट पर नाम लिखकर नियुक्ति आदेश जारी कर दिए गए. यह कदम न केवल विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद के निर्णयों का उल्लंघन है, बल्कि विश्वविद्यालय प्रशासन की नियमनिरपेक्षता और मनमानी को भी उजागर करता है. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी न्यूनतम योग्यता विनियम 2018 के अनुसार किसी भी विश्वविद्यालय या महाविद्यालय में अध्यापन हेतु नेट/सेट या पीएचडी योग्यता अनिवार्य है

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