भोपाल।मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने दि. जैन मंदिर में प्रवचन देते हुए कहा कि धार्मिक क्रियाओं और संत समागम का उद्देश्य हमारे संस्कार और आचरण में सुधार लाना होना चाहिए। उन्होंने कहा, भाव से ही भव सुधरता है और भाव से ही भव बिगड़ता है,इसलिए भाव शुद्धि ही धर्माचरण का मुख्य लक्ष्य होना चाहिए। मुनि श्री ने कहा कि केवल पूजा-पाठ, व्रत या उपवास करने से नहीं, बल्कि अच्छे विचार, भावना और आत्मवोध से ही जीवन सार्थक बनता है। उन्होंने समझाया कि जब व्यक्ति अपने स्वरूप का बोध कर लेता है कि मैं शुद्ध आत्मा हूं,तो संयम स्वतः आ जाता है और जीवन में भटकाव समाप्त हो जाता है। मुनि श्री ने भावों को स्थिर रखने और धर्म के मर्म को समझने का आह्वान किया।
