भोपाल। मुनि श्री प्रमाणसागर ने कहा कि जिस व्यक्ति के जीवन में कृतज्ञता का अभाव होता है, उसमें सद्गुण नहीं पनपते। उन्होंने कहा, कुरल काव्य में लिखा है कि पापों का प्रायश्चित हो सकता है, पर कृतघ्न व्यक्ति का उद्धार नहीं। मुनि श्री ने कहा कि भारतीय सभ्यता में धन्यवाद देने की परंपरा थी, जिसे पश्चिमी सभ्यता ने “एटीट्यूड” के रूप में अपनाया और हम भूल गए। उन्होंने सभी से अच्छे कार्य की प्रशंसा करने और गलती पर क्षमा मांगने की आदत डालने का आग्रह किया। विद्यार्थियों को उन्होंने प्रतिदिन पांच मिनट “भावनायोग” करने और परीक्षा के समय शांत व आत्मविश्वासपूर्ण रहने की सलाह दी। जानकारी प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने दी।
