भारत का सतर्क रहना जरूरी

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच 11 अक्टूबर 2025 की रात जो गोलाबारी और भीषण झड़पें हुईं, उन्होंने पूरे दक्षिण एशिया को एक बार फिर अस्थिरता के भंवर में झोंक दिया है. तालिबान शासन ने जहां 58 पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराने और 25 पाकिस्तानी चौकियों पर कब्जा करने का दावा किया है, वहीं पाकिस्तान सेना ने अपनी जवाबी कार्रवाई में 200 से अधिक तालिबान लड़ाकों को ढेर करने की बात कही है. यह आंकड़े भले ही प्रचार युद्ध का हिस्सा हों, पर एक तथ्य निर्विवाद है कि दोनों इस्लामी पड़ोसी देशों के बीच तनाव इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है.इस संघर्ष की जड़ें गहरी हैं. अफगानिस्तान ने पाकिस्तान पर हाल ही में काबुल और पूर्वी प्रांतों पर हवाई हमले करने का आरोप लगाया था, जबकि इस्लामाबाद ने सफाई दी कि उसका निशाना केवल तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के ठिकाने थे. लेकिन इस कथित ‘एंटी-टेरर’ कार्रवाई ने तालिबान शासन के भीतर राष्ट्रवादी भावनाओं को भडक़ाया. दरअसल,तालिबान का यह रुख अब न केवल सीमावर्ती हिंसा बल्कि डूरंड रेखा के अस्वीकार के रूप में भी उभर रहा है, जो ब्रिटिश काल से चली आ रही ऐतिहासिक असहमति का प्रतीक है. अफगान जनता और तालिबान नेतृत्व, दोनों ही डूरंड रेखा को एक कृत्रिम विभाजन मानते हैं, जबकि पाकिस्तान इसे अपनी अंतरराष्ट्रीय सीमा घोषित करता है. यही विवाद आज फिर सशस्त्र रूप में सामने आया है.इस पृष्ठभूमि में, भारत को अत्यधिक सतर्कता की आवश्यकता है. पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों की अस्थिर सीमाएं भारत के सामरिक हितों से गहराई से जुड़ी हैं. तालिबान शासन में भारत की सीमित राजनयिक उपस्थिति हाल के वर्षों में बढ़ी है,

विशेषकर मानवीय सहायता, बुनियादी ढांचा, व्यापारिक संपर्क और शिक्षा सहयोग के क्षेत्र में. काबुल में भारतीय दूतावास की पुन: सक्रियता और अफगान छात्रों के लिए छात्रवृत्तियों की बहाली इस दिशा के संकेत हैं. लेकिन यदि पाक-अफगान सीमा संघर्ष लंबा खिंचता है, तो दक्षिण एशिया में आतंकवादी नेटवर्क की पुनर्सक्रियता का खतरा वास्तविक हो जाएगा.टीटीपी, हक्कानी नेटवर्क, और आईएस-खुरासान जैसे संगठन इस अस्थिरता में अवसर तलाश सकते हैं. इनका विस्तार केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहेगा; कश्मीर, पंजाब और भारत की पश्चिमी सीमा तक इसका प्रभाव पड़ सकता है. पाकिस्तान यदि अपने घरेलू संकट—आर्थिक दिवालियापन, राजनीतिक अस्थिरता और सेना की छवि से ध्यान हटाने के लिए भारत विरोधी बयानबाजी या सीमा पर तनाव बढ़ाने का प्रयास करे, तो यह कोई नई रणनीति नहीं होगी. इतिहास साक्षी है कि हर बार जब पाकिस्तान के भीतर संकट गहराता है, वह अपने भीतरी असंतोष को भारत-विरोधी एजेंडे में बदलने की कोशिश करता है. इसलिए भारत को अपनी खुफिया और सीमा सुरक्षा एजेंसियों को अतिसतर्क मोड में रखना होगा.इसके साथ ही, नई दिल्ली को कूटनीतिक रूप से भी सक्रिय रहना चाहिए. सऊदी अरब और कतर की मध्यस्थता ने यद्यपि अस्थायी युद्धविराम कराया है, पर एक स्थायी समाधान के लिए भारत को क्षेत्रीय संवाद में रचनात्मक भागीदार बनना चाहिए. भारत की यह भूमिका न केवल दक्षिण एशिया में उसकी जिम्मेदार शक्ति की छवि को मजबूत करेगी, बल्कि अफगान जनता में विश्वास का आधार भी गहरा करेगी. अफगानिस्तान में भारत की छवि एक विकास और स्थिरता के साझेदार की रही है, जिसे और सशक्त बनाने की आवश्यकता है. कुल मिलाकर यह समय किसी भी प्रकार की निष्क्रियता का नहीं है. पाकिस्तान और अफगानिस्तान की ज्वलंत सीमा भारत के लिए चेतावनी है कि आतंकवाद, राजनीतिक अस्थिरता और कट्टरता का यह त्रिकोण क्षेत्रीय शांति के लिए दीर्घकालिक चुनौती बन सकता है. भारत की नीति स्पष्ट होनी चाहिए,सतर्कता, संयम और सामरिक सक्रियता. यही तीन शब्द दक्षिण एशिया में भारत की स्थायी सुरक्षा और नेतृत्व की कुंजी हैं.

 

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