भारत-अफगानिस्तान के रिश्तों में नई गर्माहट

अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी की भारत यात्रा ने दक्षिण एशिया की कूटनीति में एक नया अध्याय खोल दिया है. यह यात्रा केवल औपचारिक राजनयिक संवाद नहीं, बल्कि 2021 में अशरफ गनी सरकार के पतन और तालिबान शासन की पुनस्र्थापना के बाद भारत और अफगानिस्तान के बीच उच्च-स्तरीय संपर्क का सबसे ठोस संकेत है. चार वर्षों से भारत ने अफगान स्थिति पर “सतर्क प्रतीक्षा” की नीति अपनाई थी, परंतु अब काबुल में अपने तकनीकी मिशन को दूतावास का दर्जा देने की घोषणा यह दर्शाती है कि नई दिल्ली बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों में अपने हितों और संबंधों को संतुलित रूप से आगे बढ़ाना चाहती है.

भारत और अफगानिस्तान का संबंध केवल राजनयिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत और सांस्कृतिक गहराई से जुड़ा हुआ है. गांधार से लेकर काबुल-कंधार तक, भारत ने हमेशा अफगान भूमि को न केवल व्यापार का मार्ग बल्कि सांस्कृतिक सेतु के रूप में देखा है. बामियान की बुद्ध प्रतिमाएं, काबुल का सूफी संगीत, या अफगान छात्रों की भारतीय विश्वविद्यालयों में उपस्थिति — इन सबने दोनों देशों के बीच आत्मीयता की निरंतर धारा बनाए रखी. स्वतंत्रता के बाद भी, भारत ने अफगानिस्तान के विकास में गहरी भूमिका निभाई — चाहे वह सलमा डैम हो, अफगान संसद भवन का निर्माण, या स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में सहायता.अफगान विदेश मंत्री मुत्ताकी की यात्रा इस ऐतिहासिक मित्रता को पुनर्जीवित करने का अवसर है. उन्होंने स्पष्ट कहा कि अफगानिस्तान भारत को “घनिष्ठ मित्र” मानता है और अपनी भूमि का उपयोग किसी अन्य देश के विरुद्ध नहीं होने देगा. यह कथन, अपने आप में, भारत की सुरक्षा चिंताओं को शांत करने वाला है. विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने भी अपनी प्रतिक्रिया में यह रेखांकित किया कि भारत आतंकवाद को दोनों देशों की साझा चुनौती मानता है और सहयोग का यही आधार भविष्य में स्थिरता का रास्ता खोलेगा.

भारत ने अफगानिस्तान में मानवीय सहायता को भी कूटनीतिक सेतु बनाया है. 20 एम्बुलेंस, 6 नई विकास परियोजनाओं, और भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्निर्माण सहायता जैसे कदम, केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि भारतीय कूटनीति के मानवीय स्वरूप का परिचायक हैं. यही कारण है कि आज भी अफगान जनता भारत के प्रति गहरी सद्भावना रखती है, भले ही शासन में बदलाव आया हो.

लेकिन इस बढ़ती नजदीकी का सबसे अधिक असहज पड़ोसी निस्संदेह पाकिस्तान है. दशकों से पाकिस्तान अफगानिस्तान को अपने “रणनीतिक पड़ोसी” के रूप में देखता रहा है. भारत और अफगानिस्तान की नजदीकी उसकी सुरक्षा और सामरिक सोच को सीधे चुनौती देती है. भारत की कूटनीति ने तालिबान शासन से सीधे संवाद कर यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि नई दिल्ली अफगानिस्तान की वास्तविक सत्ता संरचना से बातचीत करने में अब हिचकिचाएगी नहीं. यह पाकिस्तान के उस पुराने दावे को भी कमजोर करता है कि अफगानिस्तान केवल इस्लामाबाद के प्रभाव क्षेत्र में है.दरअसल, भारत और अफगानिस्तान की नजदीकी दक्षिण एशिया में शक्ति-संतुलन के नए दौर की शुरुआत है. भारत जिस व्यावहारिक कूटनीति का प्रदर्शन कर रहा है — न तो तालिबान शासन को वैधानिक मान्यता दी है, न ही उससे पूरी दूरी बनाए रखी है — वही “मध्यमार्गीय यथार्थवाद” भारत के दीर्घकालिक हितों को साधने का सही तरीका है.

मुत्ताकी की यात्रा यह भी दिखाती है कि अफगानिस्तान भारत की विकास क्षमता, स्वास्थ्य-सेवा और शिक्षा के योगदान को अभी भी एक भरोसेमंद सहयोग के रूप में देखता है. आने वाले समय में, अगर यह संवाद विश्वास की ठोस नींव पर टिका रहा, तो यह न केवल दोनों देशों के लिए, बल्कि पूरे मध्य और दक्षिण एशिया के लिए शांति, स्थिरता और पारस्परिक समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करेगा.भारत और अफगानिस्तान का रिश्ता समय की कसौटी पर खरा उतरा है. अब यह संबंध राजनीतिक व्यवहारिकता और मानवीय साझेदारी के संगम पर खड़ा है और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है.

 

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