नयी दिल्ली, 19 सितंबर (वार्ता) विश्व स्वास्थ्य संगठन् (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार दुनिया में प्रति वर्ष अनुमानित 54 लाख लोग सर्पदंश का शिकार होते हैं और इनमें से 81 हजार से एक लाख 37 हजार तक लोगों की मौत हो जाती है।
डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ज़हरीले सांपों के काटने से लकवा हो सकता है, जिससे सांस लेनी बंद हो सकती है। शरीर में आंतरिक स्तर पर घातक रक्तस्राव हो सकता है और आंतरिक अंगों में स्थायी विकलांगता हो सकती है। सांप के काटने से अधिकतर कृषि मजदूर और बच्चे सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं। सांप के काटने से जितने लोगों की मौत होती है, उससे लगभग तीन गुना लोगों को अंग विच्छेदन या स्थायी विकलांगता का सामना करना पड़ता है।
कई उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय देशों में सांप का काटना एक उपेक्षित जन स्वास्थ्य समस्या है। इनमें से ज़्यादातर अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका में होते हैं। एशिया में हर साल लगभग 20 लाख लोग सांपों के ज़हर का शिकार होते हैं, जबकि अफ्रीका में अनुमानतः हर साल 4,35,000 से 5,80,000 सांप के काटने के मामले होते हैं, जिनका इलाज ज़रूरी होता है। निम्न और मध्यम आय वाले देशों के गरीब ग्रामीण समुदायों में सर्पदंश महिलाओं, बच्चों और किसानों को प्रभावित करता है। सबसे ज़्यादा बोझ उन देशों में पड़ता है, जहां स्वास्थ्य प्रणालियां सबसे कमज़ोर हैं और चिकित्सा संसाधन सीमित हैं।
सांप के काटने से सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी चिंतायें तेजी से बढ़ रही है। इसे लेकर स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (एमओएचएफडब्ल्यू) ने भारत में सांप के काटने के मामलों और इससे होने वाली मौतों को ‘सूचित करने योग्य बीमारी’ घोषित किया है।
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार भारत में हर साल 30 से 40 लाख लोग सांप के काटने के शिकार होते हैं, जिनमें से लगभग 50,000 लोगों की मौत हो जाती है। यह वैश्विक स्तर पर सांप काटने वाली मौतों का आधा हिस्सा है। इन मामलों की हालांकि रिपोर्टिंग बहुत कम की जाती है। सांप के काटने की घटनाओं और मृत्यु दर की कम रिपोर्टिंग आम है। अनुमान है कि 2000-2019 के बीच सांप के काटने से 12 लाख भारतीयों की मृत्यु हुयी है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) के स्वास्थ्य सचिवों को लिखे पत्र में कहा,
“ सांप काटना सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता का विषय है और कुछ मामलों में, यह मृत्यु, बीमारी और विकलांगता का कारण बनता है। किसान, आदिवासी आबादी आदि इसके अधिक जोखिम में हैं। सभी राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों को कहा गया है कि राज्य सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिनियम या अन्य लागू कानून के तहत प्रासंगिक प्रावधानों के तहत सर्पदंश के मामलों और मौतों को ‘सूचित करने योग्य रोग’ (नोटिफिएबल डिजीज) बनाया जाये।”
देश में लगभग 90 प्रतिशत सांप काटने के मामलों के लिए कॉमन करैत, इंडियन कोबरा, रसेल वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर जिम्मेदार हैं। इन चारों के प्रति हालांकि ‘पॉलीवैलेंट एंटी-स्नेक वेनम’ विषरोधक 80 प्रतिशत मामलों में प्रभावी है, लेकिन सर्पदंश के रोगियों के उपचार के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी चिंता का विषय बनी हुई है।
केन्द्र सरकार ने वर्ष 2030 तक सर्पदंश से संबंधित मौतों को आधा करने का लक्ष्य रखा है। इस योजना में सर्पदंश प्रबंधन, नियंत्रण और रोकथाम में शामिल हितधारकों की परिभाषित रणनीति, भूमिकायें और जिम्मेदारियां शामिल हैं। सांप काटने की घटनाओं और मौतों पर सटीक नजर रखने के लिए एक मजबूत निगरानी प्रणाली विकसित करने का आह्वान किया गया है।
सांप के काटने से होने वाली अधिकांश मौतों और गंभीर परिणामों को पूरी तरह से रोका जा सकता है। उच्च गुणवत्ता वाले विषरोधक, सांप के काटने के अधिकांश विषैले प्रभावों को रोकने या उलटने के लिए सबसे प्रभावी उपचार हैं। ये विश्व स्वास्थ्य संगठन की आवश्यक दवाओं की सूची में शामिल हैं और सांप के काटने की घटनाओं वाले किसी भी प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल पैकेज का हिस्सा होने चाहिए।
विषरोधकों के निर्माण में एक महत्वपूर्ण चुनौती सही इम्यूनोजेन्स (सांप के विष) का निर्माण है। वर्तमान में बहुत कम देशों में विषरोधकों के निर्माण हेतु पर्याप्त गुणवत्ता वाले सांप विष का उत्पादन करने की क्षमता है, और कई निर्माता सामान्य व्यावसायिक स्रोतों पर निर्भर हैं। ये स्रोत कुछ व्यापक प्रजातियों के विष में होने वाली भौगोलिक विविधता को ठीक से प्रतिबिंबित नहीं कर सकते हैं। इसके अलावा, सांप के काटने की गंभीर समस्या वाले देशों में विषरोधकों के नियंत्रण के लिए नियामक क्षमता की कमी के कारण विषरोधकों की गुणवत्ता और उपयुक्तता का आकलन करने में असमर्थता होती है।
सर्पदंश से मरने वालों लोगों की संख्या में बढ़ोत्तरी के कई कारण हैं, जिनमें कई निर्माताओं का विषरोधकों का उत्पादन बंद करना और इनकी कीमतों में काफी बढ़ोत्तरी होना शामिल है। पिछले 20 वर्षों में कुछ विषरोधक उत्पादों की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है, जिससे ज़रूरतमंद लोगों में से अधिकांश के लिए यह उपचार वहनीय नहीं रह गया है। बढ़ती कीमतों ने मांग को और भी कम कर दिया है, यहां तक कि कुछ क्षेत्रों में विषरोधकों की उपलब्धता में उल्लेखनीय कमी आयी है। कुछ बाज़ारों में अनुपयुक्त, बिना जांचे-परखे, या यहां तक कि नकली विषरोधक उत्पादों ने भी उपचार को बाधित किया है।

