भोपाल: कटनी जिले के झिन्ना और हरैया गांव की खदानों को लेकर फिर बड़ा अपडेट सामने आया है। राज्य सरकार ने 16 अप्रैल 2024 को जारी किए गए उन आदेशों को पूरी तरह निरस्त कर दिया है, जिनमें सुप्रीम कोर्ट में दायर एसएलपी को वापस लेने का निर्देश दिया गया था। जांच में पाया गया कि वे आदेश नियमों के खिलाफ थे, क्योंकि अगर वन विभाग का निर्णय अंतिम मानना था तो शासन को पहले अधिसूचना जारी करनी चाहिए थी, जो कभी जारी ही नहीं हुई। इस आधार पर अब 16 सितंबर 2025 को सरकार ने पुराने आदेश रद्द कर दिए हैं।
झिन्ना गांव का विवाद
झिन्ना गांव की लगभग 120 एकड़ जमीन 1994 में पट्टे पर दी गई थी, जिसकी अवधि 2014 तक थी। लेकिन बाद में यह पट्टा अन्य कारोबारी को ट्रांसफर कर दिया गया। विवाद इसलिए खड़ा हुआ क्योंकि यह जमीन 1955 से वन विभाग के कब्जे में थी और 1958 में इसे संरक्षित वन घोषित कर दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
वन विभाग ने इस विवादित जमीन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की थी। लेकिन अप्रैल 2024 में सरकार ने अचानक केस वापस लेने के आदेश जारी कर दिए। इस पर वरिष्ठ पत्रकार संतोष उपाध्याय ने मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और वन विभाग को शिकायत भेजी थी। इसके बाद तत्कालीन वन मंत्री नागर सिंह चौहान से विभाग वापस ले लिया गया और एसीएस जेएन कंसोटिया का तबादला भी इसी विवाद से जुड़ा माना गया।
हरैया गांव में धड़ल्ले से खनन
विवाद केवल झिन्ना तक सीमित नहीं है। हरैया गांव में 231 हेक्टेयर में से 222 हेक्टेयर जमीन को जंगल की श्रेणी में माना गया है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि वहां बड़े पैमाने पर खनन जारी है। मशीनों से पहाड़ काटे जा रहे हैं और डंपरों में भरकर पत्थर भेजे जा रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का मामला
हरैया गांव की जमीन को लेकर केस सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। कोर्ट के आदेश से पहले वहां से एक पत्थर भी हटाना गैरकानूनी है, लेकिन वास्तविकता यह है कि पहाड़ तक उखाड़ दिए गए हैं। इस पर कोर्ट की सीधी अवमानना का आरोप लग रहा है।
