इंदौर:मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने हुकुमचंद मिल परिसर को लेकर चल रहे विवाद पर अहम फैसला सुनाया है. अदालत ने मिल की 42 एकड़ भूमि को सिटी फॉरेस्ट घोषित करने और परिसर की हरियाली को न काटने संबंधी याचिका को निरस्त कर दिया. कोर्ट ने साफ किया कि हाउसिंग बोर्ड ने भूमि के अधिग्रहण के लिए 421 करोड़ रुपए का भुगतान कर दिया है, इसलिए अब उसके विकास के अधिकार को छीना नहीं जा सकता.
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि हुकुमचंद मिल वर्ष 1992 से बंद है और मजदूरों सहित सभी बकाया का भुगतान इस राशि से किया जा चुका है. अधिग्रहण के समय किसी भी याचिकाकर्ता ने आपत्ति दर्ज नहीं की थी, ऐसे में अब वर्षों बाद विकास पर रोक लगाने का कोई औचित्य नहीं बनता. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वन अधिनियम में सिटी फॉरेस्ट जैसी कोई अवधारणा नहीं है.
राज्य शासन पहले ही कनाडिया क्षेत्र में एक लाख पौधे लगाकर सिटी फॉरेस्ट विकसित कर रहा है. साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाउसिंग बोर्ड की ई-निविदा केवल झाड़ियों और झाड़-झंखाड़ हटाने के लिए जारी की गई है, उसमें कहीं भी पेड़ों की कटाई का उल्लेख नहीं है. इस प्रकरण में शासन का पक्ष अतिरिक्त महाधिवक्ता आनंद सोनी ने रखा. अदालत के आदेश के बाद हुकुमचंद मिल प्रांगण के विकास का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है और अब परियोजना के क्रियान्वयन में कोई कानूनी अड़चन शेष नहीं रही.
