नयी दिल्ली, 01 सितंबर (वार्ता) केन्द्रीय जनजातीय मामलों के राज्य मंत्री दुर्गादास उइके ने कहा है कि ‘आदि वाणी’ ऐप का बीटा संस्करण दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों के लिए संचार की खाई को पाटने, आदिवासी युवाओं को डिजिटल रूप से सशक्त बनाने और आदि कर्मयोगी अवसंचना के तहत अंतिम छोर तक सेवाओं की आपूर्ति में सहायता करेगी।
श्री उइके ने यहां मंत्रालय की ओर ‘आदि वाणी’ ऐप के बीटा संस्करण की शुरुआत किये जाने के मौके पर कहा कि जनजातीय भाषाओं के लिए भारत का पहला कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) संचालित अनुवादक वृहद भाषा मॉडल की ओर अग्रसर है।
उन्होंने कहा, “आदि वाणी’ जनजातीय भाषाओं में शिक्षा, शासन और उद्यमिता तक पहुंच बढ़ायेगी।”
उन्होंने कहा कि भाषा सांस्कृतिक पहचान की नींव है और समुदायों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
जनजातीय कार्य मंत्रालय के सचिव विभु नायर ने इस मौके पर ‘आदि वाणी’ ऐप को एक किफायती नवाचार बताया, जो व्यावसायिक मंचों की लागत का लगभग दसवां हिस्सा है। उन्होंने बताया कि यह परियोजना अत्याधुनिक तकनीक को राज्य जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (टीआरआई) द्वारा एकत्रित प्रामाणिक भाषाई आंकड़ों के साथ एकीकृत करती है और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से निरंतर सुधार को बढ़ावा देने के लिए एक फीडबैक प्रणाली के साथ डिज़ाइन की गयी है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) दिल्ली के निदेशक प्रो. रंजन बनर्जी ने इस मौके पर कहा कि आदि वाणी दर्शाती है कि कैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं के संरक्षण के लिए प्रभावी ढंग से किया जा सकता है और साथ ही लोगों के जीवन पर सार्थक प्रभाव डाला जा सकता है।
मंत्रालय के संयुक्त सचिव अनंत प्रकाश पांडे ने कहा कि भाषा के ह्रास से संस्कृति और विरासत का क्षरण होता है। उन्होंने कहा कि आदि वाणी ऐप केंद्र सरकार, टीआरआई के माध्यम से राज्य सरकारों और प्रमुख तकनीकी संस्थानों के बीच सहयोगात्मक प्रयासों का परिणाम है, जो इसे जनजातीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए एक कम लागत वाला, उच्च प्रभाव वाला समाधान बनाता है।
आदि वाणी कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित एक अनुवाद टूल है और समुदायों को जोड़ने एवं सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने का एक मंच है। यह पहल लुप्तप्राय भाषाओं के डिजिटलीकरण में सहायता करेगी, मूल भाषाओं में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और शासन तक पहुंच में सुधार करेगी, जनजातीय उद्यमिता को बढ़ावा देगी और शोधकर्ताओं के लिए ज्ञान के स्रोत के रूप में कार्य करेगी।
आदि वाणी को भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली की अगुवाई में बिट्स पिलानी और कुछ अन्य संस्थानों के सहयोग से विकसित किया गया है।
ऐप का बीटा संस्करण जल्द ही प्ले स्टोर और आईओएस पर उपलब्ध होगा। बीटा लॉन्च चरण में, यह संथाली (ओडिशा), भीली (मध्य प्रदेश), मुंडारी (झारखंड) और गोंडी (छत्तीसगढ़) को सपोर्ट करता है, जबकि कुई और गारो भाषाओं पर विकास कार्य चल रहा है।
