नयी दिल्ली (वार्ता) बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने दिल्ली के उपराज्यपाल की ओर से गत 13 अगस्त को जारी उस अधिसूचना को वापस लेने की मांग की है जिसमें राजधानी के पुलिस थानों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पुलिस अधिकारियों के साक्ष्य दर्ज करने के लिए स्थान निर्धारित किया गया है।
बीसीआई के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा और सह-अध्यक्ष वेद प्रकाश शर्मा के संयुक्त हस्ताक्षरित पत्र में काउंसिल ने अधिवक्ताओं की ओर से सामूहिक विरोध दर्ज कराया और चेतावनी दी कि यह कदम निष्पक्ष सुनवाई के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है और इसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिए।
बीसीआई ने आगाह किया कि जांच एजेंसियों के नियंत्रण वाले पुलिस थानों के भीतर गवाही की अनुमति देने से अभियुक्तों के अधिकार खतरे में पड़ सकते हैं और मुकदमे की कार्यवाही की अखंडता से समझौता हो सकता है। मुकदमों में तेजी लाने में तकनीक की भूमिका को स्वीकार करते हुए काउंसिल ने इस बात पर जोर दिया कि साक्ष्य केवल गवाह की प्रत्यक्ष उपस्थिति में ही अदालत में दर्ज किए जा सकते हैं।
बीसीआई ने कहा “हम तकनीकी प्रगति के लिए प्रतिबद्ध हैं, लेकिन ऐसे महत्वपूर्ण बदलावों के लिए बार, न्यायपालिका और अन्य हितधारकों के साथ विचार-विमर्श के बाद ही निर्णय लिया जाना चाहिए।”
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन, दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन और दिल्ली के सभी जिला न्यायालय बार एसोसिएशनों की समन्वय समिति ने भी बीसीआई का समर्थन किया है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 265 के तहत जारी 13 अगस्त की अधिसूचना में राजधानी के 226 पुलिस थानों को ऐसे स्थान के रूप में नामित किया गया है जहां से पुलिस अधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से गवाही दे सकते हैं। धारा 265(3) का दूसरा प्रावधान सरकार द्वारा अधिसूचित स्थान पर गवाहों की इलेक्ट्रॉनिक रूप से पूछताछ करने की अनुमति देता है।
बीसीआई ने हालांकि दोहराया है कि ऐसी गवाही खुली अदालत में व्यक्तिगत गवाही का स्थान नहीं ले सकती, जो आपराधिक मुकदमों की निष्पक्षता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है।
