द्विपक्षीय संबंधों में सुधार के संकेत

चीनी विदेश मंत्री की हालिया भारत यात्रा द्विपक्षीय संबंधों में जमी बर्फ पिघलाने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है. लद्दाख की पहाडिय़ों से लेकर ब्रह्मपुत्र के जल तक और वैश्विक मंचों से लेकर व्यापारिक गलियारों तक,दोनों देशों ने अनेक मुद्दों पर बातचीत की और समझौते किए. लेकिन सवाल यह है कि क्या ये सहमतियां स्थायी विश्वास और व्यवहारिक सुधार में बदल पाएंगी ? इनमें सबसे महत्वपूर्ण पहलू सीमा विवाद है. दरअसल, निष्पक्ष, उचित और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य” समाधान खोजने की सहमति अपने आप में एक सकारात्मक संकेत है. डब्ल्यूएमसीसी के तहत विशेषज्ञ समूह और कार्यकारी समूह की स्थापना बताती है कि दोनों पक्ष धीरे-धीरे संरचनात्मक संवाद की ओर बढऩा चाहते हैं. परंतु अनुभव बताता है कि वास्तविक प्रगति तभी होगी जब जमीनी स्तर पर शांति और स्थिरता सुनिश्चित हो. गश्ती दलों के बीच टकराव या अधूरी सहमति से इस प्रक्रिया की नींव कभी भी डगमगा सकती है. बहरहाल, व्यापार और आर्थिक सहयोग की दिशा में उठाए गए कदम अधिक उल्लेखनीय हैं. लिपुलेख, शिपकी ला और नाथू ला के जरिए सीमा व्यापार का फिर से आरंभ होना न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए, बल्कि विश्वास बहाली के लिए भी महत्त्वपूर्ण है. भारत-चीन व्यापार संबंधों में आज भी भारी असंतुलन है. इस संदर्भ में निवेश प्रवाह और संवाद तंत्र को पुनर्जीवित करना जरूरी है, ताकि आर्थिक साझेदारी केवल आंकड़ों तक सीमित न रहकर समानता और पारदर्शिता पर आधारित हो.लोगों से लोगों के संपर्क बढ़ाने पर सहमति,सीधी उड़ानें, वीज़ा प्रक्रिया में सुगमता, और कैलाश-मानसरोवर यात्रा का विस्तार,

सांस्कृतिक और धार्मिक जुड़ाव को मजबूती देगा. यह वह क्षेत्र है जहां राजनीति की कठोरता को समाज और संस्कृति की गर्माहट से संतुलित किया जा सकता है.

नदी जल डेटा साझा करने का मुद्दा भी विशेष ध्यान देने योग्य है. ब्रह्मपुत्र पर चीन के मेगा बांध भारत के लिए चिंता का विषय रहे हैं. आपात स्थितियों में मानवीय आधार पर जल डेटा साझा करने का चीनी आश्वासन स्वागत योग्य है, परंतु इसे कानूनी ढांचे और नियमित आदान-प्रदान के रूप में संस्थागत करना होगा.

भारत ने आतंकवाद के खतरे और चीन-पाकिस्तान समीकरण पर अपनी चिंता स्पष्ट की. यह संदेश साफ है कि भारत किसी भी साझेदारी को तभी गंभीरता से लेगा जब राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के मुद्दों पर चीन पारदर्शी रुख अपनाए.

निस्संदेह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी विदेश मंत्री की मुलाकात तथा एसीओ सम्मेलन में भागीदारी का आश्वासन यह संकेत देता है कि दोनों देश संवाद से दूर नहीं भागना चाहते.

लेकिन इस संवाद का वास्तविक परीक्षण सीमा की बर्फीली चौकियों, ब्रह्मपुत्र के जल और व्यापार संतुलन की कसौटी पर होगा. कुल मिलाकर, भारत-चीन संबंधों में यह यात्रा एक नया अध्याय खोलने का अवसर है. समझौते स्वागत योग्य हैं, लेकिन इतिहास ने सिखाया है कि कागज़ी वादों से अधिक अहम जमीनी भरोसा और दीर्घकालिक पारदर्शिता होती है. भारत को सतर्क रहते हुए इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाना होगा,न तो अति-आशावाद के साथ और न ही अविश्वास की जकडऩ में.

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