नयी दिल्ली, 19 अगस्त (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा सेवा आयोग के लंबे समय से कार्यरत दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को राहत देने से इनकार करने वाला इलाहाबाद उच्च न्यायालय का एक फैसला मंगलवार को पलटते हुए सेवा एवं नियमितीकरण कानून में नया मानक स्थापित किया।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि वित्तीय बाधाओं को दशकों से स्थायी कार्य कर रहे कर्मचारियों को वैध नियमितीकरण से वंचित करने के लिए ‘ताबीज’ की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
पीठ ने अपने 22 पन्नों के फैसले में इस बात पर ज़ोर दिया कि सरकार (केंद्र और राज्य) केवल बाजार भागीदार नहीं है, बल्कि एक संवैधानिक नियोक्ता है। वह उन लोगों के भरोसे बजट का संतुलन नहीं बना सकता जो सबसे बुनियादी और बार-बार सार्वजनिक कार्य करते हैं।
शीर्ष अदालत ने कहा, “जहां काम दिन-ब-दिन और साल-दर-साल दोहराया जाता है, वहां प्रतिष्ठान को अपनी स्वीकृत शक्ति और संलग्नता प्रथाओं में उस वास्तविकता को प्रतिबिंबित करना चाहिए। अस्थायी स्तर के तहत नियमित श्रमिकों का दीर्घकालिक शोषण लोक प्रशासन में विश्वास को कम करता है और समान सुरक्षा के वादे का उल्लंघन करता है।”
अदालत ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि वित्तीय कठोरता का सार्वजनिक नीति में निश्चित रूप से एक स्थान है, लेकिन यह कोई ऐसा ताबीज़ नहीं है जो निष्पक्षता, तर्क और क़ानूनी आधार पर काम को व्यवस्थित करने के कर्तव्य को दरकिनार कर दे। इसके अलावा यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि ‘तदर्थवाद’ वहां पनपता है जहां प्रशासन अपारदर्शी होता है।
धरम सिंह और अन्य द्वारा दायर याचिका छह अपीलकर्ताओं से संबंधित थी, जो 1989 और 1992 के बीच चपरासी और ड्राइवर के पद पर कार्यरत थे। तीस वर्षों से अधिक की निरंतर सेवा के बावजूद उनकी स्थिति दैनिक वेतनभोगी या निश्चित मानदेय कर्मचारी जैसी ही रही, जिन्हें स्वीकृत पदों के पूरे कार्य करते हुए वर्षों तक केवल 1,500 से 2,000 रुपये प्रति माह मिलते रहे।
उन्हें राहत प्रदान करते हुए अतिरिक्त पदों के सृजन, पूर्ण नियमितीकरण, तत्पश्चात वित्तीय लाभ और अनुपालन का शपथ पत्र सहित एक क्रियाशील योजना निर्धारित की और कहा, “यह एक ऐसा मार्ग है जो अधिकारों को परिणामों में परिवर्तित करता है और इस बात की पुष्टि करता है कि प्रशासन में निष्पक्षता और पारदर्शिता अनुग्रह का विषय नहीं हैं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 के तहत दायित्व हैं।”
कर्मचारियों ने राज्य सरकार द्वारा स्वीकृत पदों के सृजन के आयोग के बार-बार प्रस्तावों को अस्वीकार करने को चुनौती दी थी। सरकार ने 1999 और फिर 2003 में वित्तीय बाधाओं और नए पदों पर प्रतिबंध का हवाला देते हुए अपीलकर्ताओं के अनुरोधों को अस्वीकार कर दिया था।
उच्च न्यायालय ने 2009 में उनकी रिट याचिका खारिज कर दी और 2017 में एक खंडपीठ ने इसे बरकरार रखते हुए कहा कि नियमितीकरण के लिए कोई नियम नहीं हैं और कोई रिक्तियां नहीं हैं।
उच्च न्यायालय ने राहत देने से इनकार करने के लिए सचिव, कर्नाटक राज्य बनाम उमा देवी मामले में सर्वोच्च न्यायालय के 2006 के फैसले का भी हवाला दिया।
अपीलकर्ताओं की ओर से पेश हुए अधिवक्ता राजेश जी इनामदार और शाश्वत आनंद ने शीर्ष न्यायालय के समक्ष तर्क दिया कि उमा देवी पर यह भरोसा पूरी तरह से अनुचित था। उन्होंने दलील दी कि यह मामला पिछले दरवाजे से नियुक्तियों का नहीं, बल्कि सरकार द्वारा मनमाने ढंग से पदों को मंजूरी देने से इनकार करने का है, जबकि आयोग ने 1991 में ही इसकी आवश्यकता को स्वीकार कर लिया था।
उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि उसी आयोग में समान पदों पर कार्यरत कर्मचारियों को नियमित कर दिया गया, जबकि अपीलकर्ताओं को अधर में छोड़ दिया गया, जो अनुच्छेद 14, 16 और 21 के तहत असंवैधानिक भेदभाव के समान है।