
नई दिल्ली, 16 अगस्त (वार्ता) विश्लेषकों का कहना है कि भारत को हिंद महासागर तटीय एसोसिएशन के देशों के साथ अपनी मजबूत पहल पर आधारित मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) करने का साहिक कदम उठाना चाहिये और ‘क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी’ (आरसीईपी) तथा ‘प्रशांतपारीय भागीदारी के लिए व्यापक एवं प्रगतिशील समझौते’ (सीपीटीपीपी) जैसे प्रमुख क्षेत्रीय व्यापार समूहों की सदस्यता प्राप्त करनी चाहिये।
विश्लेषकों की राय है कि इससे न केवल भारत का व्यापारिक दायरा बढ़ेगा, बल्कि “रणनीतिक स्वायत्तता” के प्रति देश की स्पष्ट प्रतिबद्धता का भी संदेश जायेगा, जिससे भारत अपनी शर्तों पर बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों को संभाल सकेगा।
यह विचार ऐसे समय में आया है जब भारत पर अमेरिका ने सात अगस्त से 25 प्रतिशत आयात शुल्क और रूसी तेल खरीदने के कारण 27 अगस्त से प्रभावी 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाया है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को अलास्का में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के साथ यूक्रेन में शांति के मुद्दे पर बैठक की। ट्रम्प ने बातचीत से पहले कहा, “उन्होंने (रूस ने) अपने तेल ग्राहक भारत को खो दिया है जो (उसका) 40 प्रतिशत तेल खरीद रहा था। चीन (अब भी) बहुत अधिक खरीद कर रहा है। अगर मैंने (भारत पर) पहले के बाद दूसरा शुल्क लगाया तो यह विनाशकारी होगा… लेकिन यदि मुझे लगाना पड़ा, तो मैं लगाऊँगा, शायद मुझे लगाना ही न पड़े।”
भारत के पूर्व राजदूत अनिल त्रिगुणायत ने व्यापार समझौते के लिए चल रही बातचीत के बीच अमेरिकी शुल्कों को “पूरी तरह अनुचित, बेतुके और अतार्किक” बताया। उन्होंने कहा, “रूसी तेल का बहाना बिल्कुल चलने लायक नहीं है। यूरोपीय संघ, चीन और यहाँ तक कि अमेरिका भी रूसी युद्ध मशीनरी में धन का ईंधन डाल रहे हैं। अपने हित के लिए ये सभी देश रूस से गैस और दुर्लभ मृदाओं का आयात बढ़ा रहे हैं।”
उन्होंने कहा कि रूसी कच्चे तेल के व्यापार पर “प्रतिबंध नहीं है”, केवल कीमतों पर अधिकतम सीमा लगाई गई है और अमेरिका ने बार-बार स्वीकार किया है कि भारत की खरीद ने वैश्विक तेल बाजारों को स्थिर करने में मदद की है, साथ ही यूरोप और अमेरिका को परिष्कृत उत्पादों की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित की है।”
त्रिगुणायत के अनुसार, इस तरह का एकतरफा शुल्क भारत को अपनी बहु-कोणीय नीति के तहत “अपनी सुरक्षा दीवार” और “विश्वसनीय, पारस्परिक रूप से लाभकारी साझेदारियों का एक विविध नेटवर्क” बनाने के लिए प्रेरित करेंगे। उन्होंने कहा कि भारत के खिलाफ कार्रवाई कर, “मध्यम से दीर्घावधि में, अमेरिका रणनीतिक रूप से घाटे में रहेगा”।
विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी शुल्क भारत के लिए अपने बाजारों में विविधता लाने के अवसर खोल सकता। हाल के वर्षों में, भारत ने अंगोला, अमेरिका और पश्चिम एशिया से आयात बढ़ाया है।
नयी दिल्ली स्थित फोर स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और भू-राजनीति के प्रोफेसर फैसल अहमद ने जोर देकर कहा कि कुछ क्षेत्रों पर तो असर पड़ेगा ही, “अतिरिक्त आयात शुल्क का अन्य व्यापारिक साझेदारों पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा”। उन्होंने कहा कि भारत अपने निर्यात में काफी विविधता ला पायेगा और वास्तव में उसे अन्य बाजारों की ओर मोड़ पायेगा। इसलिए, यह 50 प्रतिशत आयात शुल्क न तो अमेरिका के लिए फायदेमंद होगा और न ही यह भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार की मात्रा बढ़ाने में मदद करेगा।
उन्होंने रूसी तेल को लेकर भारत (और ब्रिक्स) पर संभावित प्रतिबंधों पर अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम की टिप्पणियों को “मात्र बयानबाजी” करार देते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, “वास्तव में नये आयात शुल्क लगाने पर भारत के रुख के लिए इसका कोई महत्व नहीं है। उनका बयान ट्रम्प की पहले ही कही गई बातों को दोहराना भर है। वास्तव में, अगर ब्रिक्स देश स्थानीय मुद्रा या गैर-डॉलर मुद्राओं में तेल का व्यापार करते हैं, तो अमेरिकी प्रतिबंध का प्रभाव निश्चित रूप से कम हो जायेगा।”
अहमद ने आगाह किया कि ट्रम्प रूसी तेल मुद्दे का इस्तेमाल “मोलभाव के लिए नहीं, बल्कि एक निवारक के रूप में” भारत को चीन के खिलाफ अमेरिका का साथ देने के लिए मजबूर करने के लिए कर रहे हैं। उन्होंने भारत से तुरंत कार्रवाई करने का आग्रह करते हुए कहा, “रणनीतिक स्वायत्तता ही सही रास्ता है।”
अलास्का शिखर सम्मेलन के प्रभाव के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “यह वार्ता भारत द्वारा रूसी तेल आयात पर ट्रम्प की अति संवेदनशीलता को कम करेगी। लेकिन हमें अभी भी इसके बारे में सतर्क रहना होगा, क्योंकि ट्रम्प रूसी तेल मुद्दे का इस्तेमाल सौदेबाजी के लिए नहीं, बल्कि एक निवारक के रूप में कर रहे हैं, क्योंकि वह शायद नहीं चाहते कि भारत “रणनीतिक स्वायत्तता” का प्रयोग करे! ट्रम्प चाहते हैं कि भारत खुलकर चीन के खिलाफ अमेरिका का पक्ष ले। लेकिन भारत के राष्ट्रीय हित में “रणनीतिक स्वायत्तता” निश्चित रूप से सही रास्ता है।”
भारत से इंतजार करने की बजाय कार्रवाई करने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘हम इंतजार करके देख नहीं सकते। मुझे लगता है कि हमें तुरंत कार्रवाई नहीं तो कम से कम कुछ और घोषणाएँ जरूर करनी चाहिये। इनमें कम से कम दो बातें शामिल हैं – हमें पहले आरसीईपी और फिर सीपीटीपीपी जैसे बड़े क्षेत्रीय समूहों में शामिल होने की अपनी मंशा जाहिर करनी होगी और फिर हमें हिंद महासागर तटीय एसोसिएशन में भारत के नेतृत्व वाले मुक्त व्यापार समझौते की घोषणा करनी होगी। ये दोनों पहल भारत की भू-आर्थिक और भू-रणनीतिक स्वीकार्यता को मजबूत करेंगी और ट्रंप को रोकने में मददगार होंगी।”
