सडक़ों को आवारा कुत्तों से मुक्त करने का फैसला

दिल्ली-एनसीआर में लगातार बढ़ते कुत्तों के काटने के मामले, रेबीज से मौतें और बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक पर होने वाले हमले अब सिर्फ एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर राष्ट्रीय चिंता बन चुके हैं. इस पृष्ठभूमि में भारत के सर्वोच्च न्यायालय का हालिया फैसला न केवल समयोचित है, बल्कि इसे सार्वजनिक सुरक्षा के लिहाज से ऐतिहासिक कहा जाना चाहिए.

कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि सडक़ों पर कोई भी आवारा कुत्ता नहीं होना चाहिए. इन्हें शेल्टर होम में ले जाकर नसबंदी और टीकाकरण किया जाएगा, और फिर इन्हें दोबारा सडक़ों पर नहीं छोड़ा जाएगा. साथ ही, डॉग बाइट शिकायतों के लिए हेल्पलाइन शुरू करने और 5,000 कुत्तों की क्षमता वाले शेल्टर होम बनाने का आदेश एक ठोस और व्यावहारिक समाधान की दिशा में बड़ा कदम है. यह निर्देश भी उल्लेखनीय है कि इस प्रक्रिया में बाधा डालने वालों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की जाएगी,क्योंकि अक्सर अच्छी नीतियां जमीन पर ‘सक्रिय विरोध’ के चलते असफल हो जाती हैं.

इस आदेश को लेकर कुछ पशु अधिकार कार्यकर्ताओं की आपत्तियां स्वाभाविक हैं. मेनका गांधी जैसे वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह कदम पारिस्थितिक संतुलन को नुकसान पहुंचा सकता है,लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ‘संतुलन’ तभी सार्थक है जब उसमें मानव जीवन और सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए. जब मासूम बच्चे कुत्तों के झुंड के हमलों का शिकार होते हैं, जब रेबीज जैसी घातक बीमारी से हर साल सैकड़ों लोग मरते हैं, तब यह बहस ‘भावनाओं’ से आगे बढक़र ‘व्यावहारिक समाधान’ की मांग करती है.सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को जनहित में बताया है और यह भी साफ किया है कि इसमें भावनाओं का स्थान नहीं होना चाहिए. यही इस आदेश की सबसे बड़ी ताकत है कि यह मानवीय दृष्टिकोण और तर्कसंगतता, दोनों का संतुलन साधता है. शेल्टर होम, नसबंदी, टीकाकरण और प्रशिक्षित कर्मचारियों की नियुक्ति से न केवल इंसानों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि कुत्तों को भी नियंत्रित और सुरक्षित वातावरण में रखा जा सकेगा.

आज जरूरत है कि इस पहल को सिर्फ दिल्ली-एनसीआर तक सीमित न रखा जाए. कुत्तों के काटने के मामले देश के हर हिस्से में बढ़ रहे हैं. राज्यों को भी इसी तरह की ठोस नीति बनाकर सख्ती से लागू करनी चाहिए. यह मामला ‘मनुष्य बनाम पशु’ की लड़ाई नहीं है, बल्कि ‘सुरक्षा बनाम खतरे’ का प्रश्न है.

सुप्रीम कोर्ट ने जो रास्ता दिखाया है, वह कठिन जरूर है, लेकिन यह एक जिम्मेदार और सुरक्षित समाज की ओर बढऩे का रास्ता है. अब यह सरकारों और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है कि इस आदेश को तात्कालिकता और संवेदनशीलता के साथ लागू करें,ताकि सडक़ों पर खेलते बच्चे और घर लौटते बुजुर्ग बिना डर के जी सकें.

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