रायसेन: बदलते दौर में भी जिले में सांस्कृतिक परंपराओं की महक आज भी जस की तस है। विंध्याचल और बुंदेलखंडी लोकजीवन में गहराई से रचा-बसा कजली (भुजरियां) पर्व आज रविवार को जिलेभर में हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। सावन माह की नवमी को कई घरों में विधिवत पूजन-अर्चना के साथ बोई गईं कजलियां आज अपने पूरे श्रृंगार में मंदिरों तक पहुंचाई जा रही हैं।
परंपरा के अनुसार, भक्तजन भगवान को कजली अर्पित करने के बाद रिश्तेदारों और परिचितों से कजलियों का आदान-प्रदान कर रहे हैं। इस मौके पर गले मिलना, बड़ों का आशीर्वाद लेना और सुख-दुख में सहभागी बनने की रस्में निभाई जा रही हैं। खास बात यह है कि कजली पर्व केवल उल्लास का नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का प्रतीक भी है।
लोग शोकाकुल परिवारों में जाकर उनके दुख में सहभागी बनते हैं। जिले के ग्रामीण अंचलों से लेकर नगर तक जगह-जगह कजली गीतों की गूंज है। महिलाएं और कलाकार पारंपरिक लोकगीतों से माहौल को भक्ति और आनंद से भर रहे हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी लोगों को आपसी प्रेम, भाईचारे और सांस्कृतिक जुड़ाव का संदेश दे रही है।
