एक्सप्लेनर: क्या है टैरिफ, जानें इंपोर्ट-एक्सपोर्ट शुल्क का ‘A to Z’

टैरिफ एक प्रकार का टैक्स है जो सरकारें आयातित या निर्यातित वस्तुओं पर लगाती हैं, जिसका सीधा असर व्यापार और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

नई दिल्ली, 09 अगस्त (वार्ता): अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में टैरिफ (Tariff) एक बेहद महत्वपूर्ण शब्द है, जिसे आम भाषा में आयात-निर्यात शुल्क भी कहते हैं। सरल शब्दों में, टैरिफ एक तरह का टैक्स है जिसे सरकारें दूसरे देशों से आने वाली (आयातित) या दूसरे देशों को भेजी जाने वाली (निर्यातित) वस्तुओं पर लगाती हैं। इसका मुख्य उद्देश्य घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाना और सरकार के लिए राजस्व जुटाना होता है।

टैरिफ कई प्रकार के होते हैं, जिनमें सबसे आम हैं:

  1. आयात शुल्क (Import Tariff): यह शुल्क विदेशी वस्तुओं के आयात पर लगाया जाता है। जब कोई देश किसी दूसरे देश से सामान खरीदता है, तो सरकार उस पर यह टैक्स लगाती है। इसका मकसद विदेशी सामान को महंगा बनाकर घरेलू सामान को सस्ता और आकर्षक बनाए रखना है।
  2. निर्यात शुल्क (Export Tariff): यह शुल्क किसी देश से बाहर भेजी जाने वाली वस्तुओं पर लगाया जाता है। इसका इस्तेमाल आमतौर पर तब किया जाता है जब कोई देश अपने देश में किसी वस्तु की उपलब्धता सुनिश्चित करना चाहता हो, या फिर किसी खास वस्तु के अत्यधिक निर्यात को नियंत्रित करना चाहता हो।
  3. पारगमन शुल्क (Transit Tariff): यह शुल्क तब लगाया जाता है जब कोई सामान किसी देश से होकर गुजरता है।

टैरिफ का सीधा असर व्यापार संतुलन और आर्थिक नीतियों पर पड़ता है। अधिक टैरिफ लगाने से आयातित सामान महंगा हो जाता है, जिससे उपभोक्ता को अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। वहीं, कम टैरिफ या मुक्त व्यापार नीतियों से वस्तुओं का आदान-प्रदान आसान हो जाता है, जिससे वैश्वीकरण को बढ़ावा मिलता है।

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